Wednesday, July 26, 2023

लाल कलम

 लाल किताब में कलम और स्याही का भी ज़िक्र है यानि कैसे कलम में कौन सी स्याही भरने से क्या असर है। लाल कलम में लाल स्याही को उत्तम कहा है। चंद लोग जो कभी पंडित जी से मिला करते थे, उनको तो पता ही होगा कि पंडित जी लोगों की बेहतरी के लिए अगर लाल कलम से कुछ लिख देते थे तो वह अक्सर हो जाता था। वैसे भी उनको बढ़िया कीमती कलमों का शौक था और उनकी लिखावट भी खूबसूरत थी।

एक बार मेरे ताया जी उनसे कुछ लाल कलम से लिखवाना चाहते थे। पंडित जी ने कहा कि सोच समझ कर लिखवाना क्योंकि पढ़ने वाला कई बार उल्टा पढ़ता है। इस बारे उन्होंने एक किस्सा भी बताया। किसी ने अपनी तरक्की के बारे में लिखवाया था, "टॉप सीट इन द ऑफिस"। कुछ दिन बाद उसका कुर्सी मेज दफ्तर की आखिरी मंजिल पर चला गया था जिससे उसको परेशानी हुई।

अब सवाल ये है कि पंडित जी कैसे लिखते थे? या फिर कौन लिख सकता है? आखिर इसमें क्या राज़ है? इसका किताब में इशारा किया गया है। समझदार के लिए इशारा ही काफी और नासमझदार से बस मुआफी। अब एक नासमझदार का किस्सा मैं बताता हूं।

एक साहिब थे जो पहले वैदिक जोतिश पढ़ते थे फिर लाल किताब पर आ गए। उनको पता चला कि पंडित जी काम करवाने के लिए लाल कलम से लिख देते थे। लिहाज़ा वह भी लाल बॉल पेन से लिखने लगे और पैसे वसूलने लगे। कुछ दिन बाद वह किसी केस में उलझ गए जिसकी वजह से उनको रोज़ पुलिस थाने में चक्कर लगाने पड़े। काम भी बंद हो गया उल्टा परेशानी आ गई। ये सिलसिला कई हफ्ते चलता रहा। इसके बाद उन्होंने लाल बॉल पेन को अलविदा कह दिया।

Wednesday, September 21, 2022

तबादला

 पिछले साल रात नौ बजे के बाद फोन आया। उसने कहा ठाकुर जी से बात करनी है। मैंने कहा बोल रहा हूं उसने कहा मैं मंत्री जी का पी ए बोल रहा हूं । मंत्री जी आपसे बात करना चाहते हैं। कौन मंत्री मैंने पूछा। उसने मंत्री का नाम बताया। मैंने कहा ठीक है। फिर मंत्री जी ने बात की। उन्होंने मशवरे के लिए मुझे अपने यहां बुलाया। मैंने कहा मैं नहीं आ सकता। आप कभी इधर आए तो मेरे गरीब खाने आ जाना। तकरीबन दो महीने बाद मंत्री जी का फोन आया। उन्होंने मेरे घर का पता पूछा। मैंने बता दिया और कहा अपना लाम लश्कर मत लाना। खैर घंटे बाद मंत्री जी मेरे घर पहुंच गये।

मंत्री जी ने अपनी जन्म कुण्डली बनाकर मेरे आगे कर दी। मैंने पूछा आपने मेरा फोन नंबर कहां से लिया। वह बोले आपका नंबर कौन नहीं जानता? खैर मंत्री जी ने बताया कि पिछली बार मैं सदन में अपनी पार्टी का लीडर था चुनाव के बाद हमारी पार्टी की सरकार बनी मगर मुख्य मंत्री कोई और बन गया। उन्होंने अपना मसला मेरे आगे रख दिया। उन्होंने कहा मेरी कुण्डली में भी तीन ग्रह मुश्तर्का हैं जैसे अटल जी की कुण्डली में हैं। मगर मैं मुख्य मंत्री भी न बन पाया मैंने कहा अटल जी भी पहले मंत्री बने थे फिर कई सालों बाद जा कर प्रधान मंत्री बने थे। मगर मंत्री जी को इंतजार पसंद न था। वह जल्दी में थे। चलो मैंने उपाय बता दिया और उनको विदा कर दिया।

दो ढाई महीने बाद सियासत में हलचल हुई। मुख्य मंत्री ने इस्तीफा दे दिया और मंत्री जी मुख्य मंत्री बन गये। मैं महीना भर उनका इंतजार करता रहा मगर वह न आये न ही उनका कोई फोन आया। फिर चार पांच महीने बाद चुनाव आ गया जिसमें वह हार गये।

फरमान नंबर 6 के मुताबिक चंद महदूद हस्तियां खुदा रसीदा इंसान ही रेख में मेख लगा सकते हैं। मगर उसका भी कोई तबादला दिया गया। इस केस में ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं भी कई दिन बीमार रहा और मंत्री जी भी कहीं के न रहे। उनकी कुण्डली दिलचस्पी का सबब होगी।

जन्म 2. 4. 1963



Wednesday, January 6, 2021

रुपया

 19 वीं सदी में हिंदुस्तान पर अंग्रेजी कंपनी सरकार बहादुर की हुकूमत थी। सन 1857 के ग़दर के बाद मुल्क की हुकूमत ब्रिटिश क्राउन के पास चली गई और इंग्लैंड का राजा हिन्दोस्तान का महाराजा हो गया। लिहाज़ा सिक्कों पर उसके नाम के साथ किंग एंड एम्परर लिखा जाने लगा। उस वक्त रुपया लगभग खालिस चांदी का था। जिसका वज़न एक तोला या साढ़े ग्यारह ग्राम के आस पास होता था। मगर 20 वीं सदी के शुरू में जब दुनिया की पहली बड़ी जंग शुरू हुई तो रुपये में चांदी कम होने लगी। फिर कुछ साल बाद दूसरी बड़ी जंग हुई जो सन 1945 में खत्म हुई। अब रुपये में भी चांदी ख़त्म हो चुकी थी। रुपया बस साधारण धातु का ही रह गया था। सन 1947 आज़ादी के बाद रुपये पर भारत सरकार का नाम आ गया। 20 वीं सदी के आखिर में स्टील का हो गया। फिर 21 वीं सदी में रुपये का आकार छोटा हो गया। चांदी का रुपया तो कहानियों में गुम हो गया था। हालाँकि इसकी कीमत सैकड़ों में है। ज्यादातर लोगों ने चांदी का रुपया देखा ही नहीं।

ऐसा ही कुछ लाल किताब के साथ हुआ। आखिरी किताब सन 1952 में उर्दू में छपी। वह भी कम गिनती में प्राइवेट सर्कुलेशन के लिए। किताब पर लेखक का नाम तो नहीं है मगर माना जाता है किताब मरहूम पंडित रूप चंद जोशी जी ने लिखी। पंडित जी के जीवन काल में किताब का कोई खास नाम न हुआ। शायद इसकी वजह ये थी कि पंजाब में उर्दू की तालीम बन्द हो गई थी। पंडित जी ने लाल किताब कई लोगों को दी उन लोगों में एक मैं भी हूँ। किताब पढ़ने के लिए मुझे उर्दू सीखना पड़ा। पंडित जी के इंतकाल के कई साल बाद, 20 वीं सदी के अंत में लाल किताब का नाम होने लगा। फिर क्या था, कई लाल किताबें हिंदी में छप गईं और धड़ाधड़ बिकने लगीं कोई प्राचीन लाल किताब तो कोई असली लाल किताब मगर सब के सब नकली। शायद एक आध नक़ल हो। मगर कैसे जानें? असली किताब देखी नहीं, उर्दू आता नहीं। उर्दू पढ़ने वाले भी मर मरा गए। आगे लाल किताब को संभालने वाला न था। किसी को दीमक चाट गई, कोई ख़राब हो गई तो कोई रद्दी में चली गई। आज चन्द घरों में लाल किताब बतौर शो पीस पड़ी है। लाल किताब जोतिश करने वाले ज्यादातर लाल किताबियों ने असली किताब देखी ही नहीं। देख भीं लें तो भी क्या होगा जब उर्दू ही नहीं आता। बस नकली किताबों से काम चला रहे हैं। आज ज़रूरत है उर्दू सीखने की ताकि जो काम पंडित जी ने शुरू किया था, उसको आगे बढ़ाया जा सके। अगर लाल किताब को संभाला न गया तो ये भी चांदी के रूपये की तरह कहानियों में गुम हो कर रह जायेगी।

Saturday, June 27, 2020

राजपूत

पिछले दिनों खबर आई कि अदाकार सुशांत सिंह राजपूत ने महज़ 34 साला उम्र में ख़ुदकुशी कर ली जो फ़िल्मी दुनिया के लिए किसी झटके से कम न थी। मगर यह कोई नई बात नहीं। इससे पहले अदाकार गुरुदत्त , दिव्या भारती , जिया खान वगैरह ने ख़ुदकुशी की थी। दिव्या भारती की उम्र तो फकत 19 साल थी।।
राजपूत ने अपना कैरियर टीवी से शुरू किया। फिर 2013 से फिल्मों में आ गए। उनकी फ़िल्में चलने लगीं। एक फिल्म के लिए अवॉर्ड भी मिला। फिर ख़ुदकुशी .............ऐसा क्या हुआ? यह जानने के लिए अदाकार की कुण्डली का जायज़ा लेना होगा। नैट पर जो उनकी कुण्डली मिली वो इस तरह है



अब कुण्डली कितनी सही है , कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह बहुत कुछ कह रही है।
        "हाथी बैठा तख़्त पर ,तो तख़्त थर्राने लगा
          सूरज बैठा जिस घर में ,ग्रहण वां आने लगा"
राहु खाना नं 1 और 10 में बृहस्पत सूरज शुक्र बुध। नौकरी या फिल्मों से कोई ताल्लुक। ग्रहण की वजह से लम्बी उम्र या कैरियर का कोई भरोसा न हो। मंगल केतु मुश्तर्का खाना नं 7 , शेर और कुत्ते की लड़ाई। भाई की उम्मीद नहीं पर बहन जरूर हो। चंद्र खाना नं 2 और शनि खाना नं 8 मन और माँ पर मंदा असर , या माँ का साथ लम्बा न चले और मन पर बोझ बने।
इस साल पर नज़र डालें तो खुद ही खुद के दुश्मन हो गए। मंगल बद और पापी ग्रह शनि राहु केतु मंदे। उम्र का मालिक चंद्र खाना नं 10 में रद्दी और शनि का खाना नं 5 से टकराव। राहु खाना नं 8 खूनी हाथी मौत का हुकुमनामा साथ लिए , खुद ही अपनी मौत का नक्कारा बजा दिया। बुध खाना नं 3 कोढ़ी ने दुनिया से चले जाने का रास्ता खोल दिया। लिहाजा वक्त से पहले कूच कर गए। ओम शान्ति। ख़बरों में ख़ुदकुशी की वजह डिप्रेशन बताई गई। मगर वह कौन ..........जिसने ज़िन्दगी की दिशा ही बदल दी।

Tuesday, October 22, 2019

ग्रहस्थी चक्की


             ‘‘आकाश ज़मीन दो पत्थर 7वें, रिज़क अकल की चक्की हो।
               दोनों घुमावें कीली लोहे की, घर आठवें जो होती हो।।’’

लाल किताब के मुताबिक ग्रहस्त की चक्की कुण्डली के खाना नं0 7 में चलती है। चक्की के नीचे वाला पत्थर शुक्र (रिज़क) और ऊपर घूमने वाला पत्थर बुध (अकल) है। चक्की घुमाने वाली लोहे की कीली खाना नं0 8 में होती है। शुक्र बुध मुश्तर्का मुबारक होंगे। वर्ना बुध के बिना शुक्र बेचैन ही होगा।
जन्म अस्थान, जहान का वासी, शुक्र की चीज़े, शादी, जायदाद (मकानात वगैरह), जाहिर दारी, जिस्म की जिल्द, जिस्म के मुसाम, हथेली की हर हालत का हाल, सुभाओ गर्म तर बादी, औरत, लड़की, बहन, बुध की चीजे़, पोती, चेहरे की चमक या रंग, गाय, पिस्तान, स्त्री घर, लड़कियों के रिश्तेदारों के घर, मिट्टी के ज़र्रे, पलस्तर या सफेदी मकान, मकानात का बनना, अण्डों से पैदा होने वाले परिन्दे, रूहानी ताकत मुताल्लका बुध शुक्र, कबीले की पैदाइश व परवरिश, पराई दौलत का मिलना बज़रिया बुध की नाली, नस्ल दर नस्ल व्यापार, गौयाई, कुवते वाह, अन्दुरूनी अकल दुनियावी ताल्लुक में, वक्त जवानी, मैदान दुनिया, जायदाद के लिए साथ लाये खजाने, जनूब मगरिब, दही, रंग सफेद, बुध फूल, शुक्र बीज, शुक्र बुध जैसे हो वैसा ही हाल होगा। यह सहन है खाना नं0 1 का और सेहन का मुंसिफ होगा मंगल। इस खाने मे सनीचर उच्च, सूरज नीच और शुक्र बुध पक्की हालत के ग्रह होंगे। घर का मालिक और किस्मत को जगाने वाला ग्रह शुक्र ही होगा। मर्द की कुण्डली में शुक्र उसकी बीवी और औरत की कुण्डली में शुक्र उसका शौहर होगा। मिसाल के तौर पर कुछ कुण्डलियां दिलचस्पी का सबब होंगी।





कुण्डली नं0 1 राहुल गांधी जी की है। खाना नं0 7 यानि वजीरी घर खाली और उसका मालिक शुक्र खाना नं0 2 में। स्कूल मिस्ट्रैस हर एक की दिलदादा औरत मगर खुद किसी को पसन्द न करे। खाना नं0 1 में दो ग्रह यानि तख्त पर राजे दो मगर वजीर एक भी नहीं। फिर बुध की भी कोई मदद नहीं। अब उम्र 50 साल के आस-पास हो गई है। न ग्रहस्ती चली और न ही सियासत।
कुण्डली नं0 2, फिल्मी अदाकार की बेटी ऐकता कपूर जी की है। खाना नं0 7 खाली और उसका मालिक शुक्र तख्त पर यानि खाना नं0 1 में शक्की। शुक्र का पतंग...उठती जवानी के वक्त खूबसूरती की रंग बिरंगी, दिल फरेब हुस्न की दिलचस्प और दिलरूबा सिफतों की मीठी मीठी ज़ुबान से तारीफ़ करते कराते, सोये हुए मीलों निकल गये। बुध की कोई मदद नहीं। अब उम्र 45 साल के आस-पास हो गई है।
फिल्मी चक्कर तो चल रहा है मगर ग्रहस्ती चक्की न चली।

Sunday, March 3, 2019

बातें लाल किताब की

19वीं सदी में अंग्रेज मुल्क पर काबिज हो गए थे। लिहाजा अंग्रेजी दवा का चलन शुरू हुआ।  देसी हकीमों ने अंग्रेजी दवा की बुराई की। मगर 20वीं सदी में अंग्रेजी दवा की पकड़ मजबूत हो गई और देसी दवा दूसरे दर्जे पर चली गई। आज अंग्रेजी दवा अपनी खूबी की वजह से पहली पसंद बन चुकी है। ठीक इसी तरह 20वीं सदी में लाल किताब वजूद में आई। 21वीं सदी में आते आते लाल किताब अपनी खूबी की वजह से कायम हो गई। आज लाल किताब के नाम पर हिंदी में नकल/नकली किताबें बाजार में धड़ाधड़ बिक रहीं हैं। असली किताब जो उर्दू में लिखी गई थी कम ही नजर आती है। इसकी एक वजह यह है कि आज की पीढ़ी को उर्दू नहीं आता। फिर भी नकल /नकली किताबों से कई लोग रोजी रोटी चला रहे हैं।
जिस तरह अंग्रेजी सिस्टम में सर्जरी होने की वजह से वह देशी सिस्टम पर छा गई , उसी तरह लाल किताब ग्रहों के उपाय की वजह से पराशरी पर छा गई। लिहाजा पराशरी के कई विद्वानों ने लाल किताब को अपना लिया चाहे उनके पास असली किताब नहीं है। तो कुछ लोगों ने पराशरी के साथ लाल किताब के उपाय जोड़ लिए यानि आधा तीतर आधा बटेर न छुआरा न बेर। मगर कुछ आज भी लाल किताब की बुराई कर रहे हैं। यह वह लोग हैं जिन्होंने असली किताब कभी देखी ही नहीं। देख भी लें तो भी क्या है? वह इसे पढ़ ही नहीं सकते क्योंकि उनको उर्दू नहीं आता। बस वह तो बिना वजह लाल किताब में नुक्स निकाल रहे हैं। फिजूल के वीडियो बना कर यू- ट्यूब पर डाल रहे हैं। ऐसी बातों से लाल किताब को कोई फर्क नहीं पड़ता। हाँ ऐसे लोगों पर हँसी जरूर आती है। किताब को तो पढ़ नहीं सकते खामख्वाह नुक्ताचीनी कर रहे हैं।
चंद लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने किताब के लिए उर्दू सीखा। फिर रफ्ता रफ्ता मेहनत करके किताब को पढ़ा समझा और कुछ सीखा। आज कुछ नौजवान लड़के किताब के लिए उर्दू सीख रहे हैं मुझे उनसे बहुत उम्मीद है। आने वाले वक्त में वह लाल किताब को और भी बुलंदी पर लेकर जायेंगे। मेरी दुआऐं उनके साथ हैं। वैसे भी पुराने सिस्टम को नया सिस्टम बदल देता है। आज जोतिश का नया सिस्टम है लाल किताब।

Friday, June 22, 2018

पैसा

दुनिया में आदमी की पहली और आखिरी ज़रूरत पैसा ही है। पैदा होने से लेकर मरने तक पैसा ही काम आता है। अगर पैसा हो तो ज़िन्दगी में ज्यादातर मुश्किलें आसान हो जाती हैं या आती ही नहीं। इस काइनात में आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो पैसा कमाता है। पैसे का मतलब धन दौलत से ही है। आदमी पैसा कमाने के लिए तरह-तरह के काम करता है। पैसा कमाने के लिए कई तरीके अपनाता है। सुना है कि धार्मिक स्थानों के भिखारी भी अच्छे पैसे बना लेते हैं। ’’ गरीबों की सुनो, वह तुम्हारी सुनेगा तुम एक पैसा दोगे वो 10 लाख देगा।’’ मगर आज पैसे का सिक्का बाज़ार से गायब हो गया है। बस रूपए का सिक्का है वह भी स्टील का। बर्तानवी हकूमत के दौरान रूपया चाँदी का और पैसा तांबे का होता था। रूपये में 64 पैसे हुआ करते थे। सिक्कों पर हकूमत की मोहर होती थी। सन् 1944 के आस पास पैसे में सुराख कर दिया गया यानि तांबा कम करके उसकी कीमत में बचत की गई। आज़ादी के बाद सरकार ने रूपये में 100 पैसे कर दिए मगर छोटे-छोटे। कुछ साल बाद वह भी बन्द हो गये। तांबे की कीमत भी कई गुणा बढ़ गई थी।
आज पैसे का नाम कहानियों और किताबों में ही रह गया है। लाल किताब में मंदे बुध को दुरूस्त करने के लिए तांबे के पैसे का ज़िक्र है। मसलन् बुध खाना नम्बर 5 या 11 में हो तो तांबे का पैसा गले में डालने से मदद होगी। खास हालत में तांबे के पैसे में सुराख करके दरिया में बहाना मददगार होगा। आखिर क्या है यह तांबे का पैसा ? गोल पैसा तांबे का, तांबा सूरज तो गोलाई बुध, उस पे राजशाही या हकूमत की मोहर। बन्दर को भी लाल किताब में सूरज कहा गया है और उसकी पूंछ को बुध। यानि सूरज बुध का साथ खाना नम्बर 5 और 11 जो सूरज का खास मकाम है। सूरज बुध मुश्तर्का यानि मसनूई मंगल नेक जो कुशल मंगल कर देवे। अब आप तांबे के पैसे का राज़ समझ ही गये होंगे। क्या ही अच्छा हो अगर सरकार स्टील की बजाये तांबे के सिक्के जारी करे।

Friday, February 16, 2018

शुक्र-मंगल-शनि

                शक्र  मंगल  शनि मुश्तर्का, मालिक होवे लम्बी उम्र का।
                                नेक होकर जब बैठे हों ,     गृहस्त औलाद भी देते हों।
                                दुश्मन  अगर मुकाबिल आये, मददगार  आवे बिन बुलाये।
                                अगर   फांसी  भी  हो  जावेकोई  गैबी  शै  बचावे।
                                पांव  तले  दे तख्ता  देवे, तांकि  गला    घुट  जावे।
                                मौत  का  यम ले भी  जावे, कब्र से ज़िन्दा वापिस आवे।
                                दुख  तकलीफ़  से बचता जाये, कामकाज भी होता जाये।
                                सुख  जीवन  में  मिलें  तमाम, उम्र  सारी  रहे  आराम।

                नेक हालत में गृहस्त, औलाद और उम्र, तीनों दुनियावी सुखों का उम्दा फल होगा। ऐसी ग्रहचाल के वक्त उम्र लम्बी होने में मदद मिलेगी। अगर फांसी पर भी लटका दिया जावे तो गैबी मदद पांव तले तख्ता दे देगी तांकि गला घुट जावे। अगर कोई मारने जाये तो मालिक की कृपा से बचाने वाला भी खुद--खुद पहुंचेगा। जिस तरह दुश्मन को बुलाया था, उसी तरह मददगार भी बिन बुलाये जायेगा। ऐसा शख्स दूसरों से मदद और आराम पाता रहेगा। मुसीबत और बिमारी से बचता बचाता हुआ पूरी उम्र भोगेगा। यहां तक कि मौत के यम के खिलाफ भी मदद मिल जायेगी और कब्र से ज़िन्दा वापिस जावेगा। बाप की मदद और सुख सागर लम्बा होगा। शुक्र मंगल शनि मुश्तर्का की कुछ मिसालें दिलचस्पी का सबब होंगी। समझदार के लिए इशारा ही काफी।
                                   






                कुण्डली नम्बर 1 वाली एक खूबसूरत खातून है। अब उम्र 40 साल के आस पास हो गई है मगर शादी हुई। लिहाज़ा गृहस्त सुख मिला क्योंकि तीनों ग्रह खाना नम्बर 3 में नेक नही हैं।

                कुण्डली नम्बर 2 वाले की उम्र 26 साल के आस पास है। तीनो ग्रह खाना नम्बर 7 में हैं। कुण्डली में चन्द्र ग्रहण भी है। इसलिए ग्रहण का उपाय करना बेहतर होगा।

Friday, January 5, 2018

बुध-शुक्र-शनि


बुध शुक्र शनि  जब मुश्तर्का, मालिक होवे  धन दौलत का
ग्रह   तीनो  नेक  हों  टेवे, उम्र  ग्रहस्त   औलाद  देवे।
अगर  रोशनी छत  से आये, चोरी हो  धन  दौलत जाये।
गऊ  ग्रास जो  देता  जावे, सुख  दुनियावी  तीनो पावे।
पर उल्ट कभी जब होता हो, पराया दुख दलिद्र ढोता हो।

बुध शुक्र और शुक्र शनि आपस में दोस्त हैं। बुध शुक्र शनि मुश्तर्का हो तो कुण्डली वाला गृहस्त, औलाद और उम्र तीनो ही दुनियावी सुखों का मालिक होगा। गऊ ग्रास यानि गाय कौवा और कुत्ता, तीनों को अपनी खुराक से रोटी का टुकड़ा देते रहना मुबारक होगा। मकान में स्काई लाईट (ऊपर आसमान की तरफ से रोशनी के लिए मौघा, रोशनदान) धन दौलत की चोरी व तबाही का सबूत होगा। काली गाय और काले कुत्ते को रोटी देते जाना मददगार होगा। अगर काली गाय और काला कुत्ता अपने ही घर का पालतू हो तो उनको बाहर से किसी और शख़्स की तरफ से रोटी न मिलने देवे वर्ना फायदे की बजाय नुक्सान होगा। यानि बाहर वालों के दुख दलिद्र काली गाय और काले कुत्ते की मार्फ़त खुद अपने ही घर में जमा होते रहेंगे। बुध शुक्र शनि मुश्तर्का की कुछ मिसालें दिलचस्पी का सबब होंगी। समझदार के लिए इशारा ही काफी।
       



कुण्डली नम्बर 1 वाले का घर परिवार है और छत से रोशनी भी आती है जो बन्द न हो सकी। फज़ूल खर्च और नुक्सान होता रहता है। रोशनी छत से आती रहे, दौलत घर से जाती रहे। 
कुण्डली नम्बर 2 वाले का भी मिलता जुलता हाल।  लिहाज़ा छत से आने वाली रोशनी पक्के तौर पर बन्द करवा दी गई तो ग्रह चाल भी बदल गई। रोशनी छत से कर दी बन्द, धन का फिर नुक्सान भी बन्द।

Wednesday, December 6, 2017

अपनी बात - 3

ग्रहों से पहले मुझे लकीरों का शौक हुआ था। कालेज में पहला साल ही था जब कीरो की किताब ’’वैन वर यू बौर्न’’  मेरे हाथ लगी। किताब अच्छी लगी इसलिए कई बार पढ़ी। फिर मैने रफ्ता-रफ्ता कीरो की बाकी किताबें भी हासिल की और उनको बार बार पढ़ा। लिहाज़ा मैं इस नतीजे पर पहंुचा कि कीरो (1866-1936) अपने दौर का बहुत बड़ा पामिस्ट था। इस दौरान दुनिया का कोई भी पामिस्ट उसके मुकाबिल खड़ा न हो सका। उसने अपने दौर की कई मशहूर हस्तियों के हाथों के छापे अपनी किताबों में दिये हैं। इसके अलावा उसने अपने हाथ का छापा भी दिया है। मेरे ख्याल में यह बहुत बड़ी बात है। कीरो को ’’फादर आफ पामिस्ट्री ’’ कहना गलत न होगा।
मैंने कीरो को ही अपना रहबर मान लिया और उसकी किताबों से पामिस्ट्री सीखने लगा। कुछ साल बाद मैंने हाथों के छापे भी लेने शुरू कर दिये जो सीखने और समझने में बहुत काम आये। बीस - बाईस साला उम्र में मेरे पास सैंकड़ो छापे जमा हो चुके थे। मेरी पशीनगोई  बाद में अक्सर सही निकलती थी। काम करने का तरीका कीरो वाला ही था। जिसे देखकर लोग दंग रह जाते थे। क्योंकि उस दौर में मैंने किसी भी पामिस्ट को हाथों का छापा लेते नही देखा। मेहनत और लगन का नतीजा निकलने लगा । दूसरे शहरों से छापे डाक के ज़रिए आने लगे। जिनका जवाब मैं ख़त के ज़रिए दिया करता था। फिर दूसरे मुल्कों से भी छापे आने लगे।
एक दिन एक लड़का मुझे हाथ दिखाने आया। मैंने उसके हाथ का छापा ले लिया और उसको कुछ दिन के बाद आने के लिए कहा तांकि मैं छापे का तसल्ली से मुआयना कर सकूं। उसके हाथ में एक अजब सीधी साफ सुथरी रेखा, गुरू के बुर्ज से बुध के बुर्ज तक, मेरे लिए एक नई बात थी। मैंने कीरो की किताबें दोबारा देख डाली मगर उस रेखा का केाई ज़िक्र न मिला। फिर मैंने पामिस्ट्री के कुछ और लेखकों की किताबें भी देखीं मगर उस रेखा की किसी ने भी बात न की थी।  वह अजब रेखा मेरे लिए सवालिया निशान बन के रह गई। मुझे अपने आप में कमी महसूस होने लगी।
उस रेखा ने मुझे परेशान कर दिया। यह कैसी रेखा थी जो पहले किसी ने नही देखी ? कीरो ने भी नही देखी, यह कैसे हो सकता था ? मैने कीरो की किताबें फिर से देखनी शुरू कर दीं। सुबह से शाम बस एक ही काम। एक दिन पढ़ते-पढ़ते रात को मेरी आंख कब लग गई, मुझे पता ही न चला। बादलों की गड़गड़ाहट से अचानक मेरी आंख खुली। आसमानी बिजली की चमक से कमरे में कुछ उजाला हुआ। मैंने देखा कुर्सी पर एक गोरा आदमी बैठा मुस्करा रहा था। चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लगा। फिर बिजली की चमक गायब हो गई और कमरे में अंधेरा छा गया। यह क्या ? मैंने झट से उठकर कमरे की बिजली जलाई मगर कमरे में  कोई न था। कुर्सी खाली पड़ी थी। मेरे सिरहाने कीरो की किताब खुली पड़ी थी। मेरी नज़र उस पर पड़ी। उस रेखा के बारे तफ़सील से लिखा हुआ मिल गया। मैं हैरान रह गया। समझ नही आया कि यह कोई करिश्मा था या महज़ इत्तफ़ाक। ख़ैर मेरा मसला हल हो गया और दिल को सकून मिल गया।

Friday, November 17, 2017

सूरज-शुक्र-बुध

सूरज से राज दरबार तो शुक्र से घर परिवार। सूरज-बुध और शुक्र-बुध तो दोस्त हैं मगर सूरज-शुक्र दुश्मन हैं। तीनों कुण्डली में मुश्तर्का अमूमन मन्दा फल ही देंगे। अब बुध का खाली चक्कर सूरज की मदद लेकर शुक्र को बरबाद करेगा। गृहस्थी हालत का फैसला केतु की हालत पर होगा। अगर केतु उम्दा हो और बुध को मदद देवे तो कोई मन्दी हालत न होगी। लेकिन अगर केतु मन्दा हो तो औलाद न होगी या देर से होगी। औरत के टेवे में तीनों ग्रह मुश्तर्का किसी भी खाने में होने के वक्त लड़का पैदा होने और मर्द के टेवे में लड़की पैदा होने पर औरत किसी न किसी तरह बरबाद ही होगी। औरत का कोई रिश्ते का भाई औलाद पैदा करने या कराने का बहाना होवे। चाल चलन की बदनामी की तोहमत सच्ची या झूठी ज़रूर होगी।
तीनो ग्रह खाना नम्बर 8 में होने के वक्त अगर शादी बुध की उम्र में हो तो तीन साल के अन्दर-अन्दर औरत की मौत दिन के वक्त बरसरे बाज़ार हादसा में होगी। तीनों खाना नम्बर 3 और सनीश्चर खाना नम्बर 12 के वक्त मकान की तह ज़मीन में बादाम दबा देना, औलाद की पैदायश में बरकत देगा। तीनो खाना नम्बर 9 के वक्त फक़ीर को रोटी देना मददगार होगी। तीनों खाना नम्बर 10 के वक्त साली का रिश्ता अपने ही परिवार मेें होना गैर मुबारक होगा।
आमतौर पर हाथ में खालिस चांदी का छल्ला निहायत मददगार होगा। मन्दी हालत की निशानी घर में निवार के गोल किये हुए बण्डल मुद्दत से बन्द पड़ी होगी, जिसकी मौजूदगी तीनों ग्रहों का मन्दा फल होने का आम सबूत होगा। इसको इस्तेमाल कर लेना या हटा देना ही बेहतर होगा। बवक्त शादी लड़की का दान करने के ठीक बाद तांबे की गागर सालम मूंग से भरकर, जिस तरह लड़की का दान दिया गया, उसी तरह तांबे की गागर का संकल्प कर दिया जाये और बाद में उसे दिन के वक्त किसी नदी या दरिया में बहा दिया जावे। ऐसी ग्रह चाल के वक्त चाहे किसी भी घर में हो, यह उपाय मददगार होगा। सूरज-शुक्र-बुध मुश्तर्का को समझने के लिए चन्द मिसालें मददगार होंगी।



पहली कुण्डली मंे तीनो ग्रह खाना नम्बर 12 में जहां बुध ज़हरीला है। काम काज के लिए विदेश गये तो औरत ने साथ छोड़ दिया। वापिस आकर घर में गोले तलाश किये गये मगर न मिले। दो साल बाद अचानक गोले मिल गये और हटा दिये गये।  अब दूसरी शादी की तैयारी हो रही है। दूसरी कुण्डली में तीनों ग्रह खाना नम्बर 10 में है। शादी हो गई मगर नर औलाद पैदा न हुई और न ही कोई उम्मीद है। बेटियां दो हो गईं। काम काज भी ठीक नही। 




तीसरी कुण्डली में तीनों ग्रह खाना नम्बर 5 में है। शादी हो गई और औलाद का कोई अता पता नही है। बस उम्मीद पर वक्त कट रहा है। चैथी कुण्डली एक अमीर कारोबारी आदमी विजय माल्या की है। तीनो ग्रह खाना नम्बर 11 में है। पहली शादी से एक औलाद हुई और फिर तलाक हो गया। दूसरी शादी एक बेवा से कर ली मगर रंगीनिया बढ़ती गई। कामकाज भी चैपट हो गया। अदालत ने उनके खिलाफ वारंट गिरफ्तारी जारी कर दिया। वह भी इंग्लैण्ड भाग गये। अब अदालत ने उनको पी0ओ0 (भगौड़ा) करार दे दिया है।
   




पांचवी कुण्डली फिल्मी अदाकार दिलीप कुमार की है। शादी हुई भी तो बुढापे में, जिससे एक मुर्दा औलाद पैदा हुई। कुछ साल बाद दूसरी शादी की मगर जल्द ही तलाक हो गया। अब औलाद की क्या उम्मीद होगी। काफी बूढ़े हो गये हैं। छट्टी कुण्डली टाटा ग्रुप के रतन टाटा जी की है। तीनो ग्रह खाना न. 1 में और खाना न. 7 खाली। इनकी शादी नहीं हुई शायद। बच गये।


 





  सातवीं कुण्डली अपने दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना की है जिन्होने 1970 के आस पास फिल्मी दुनिया में तहलका मचा दिया था। तीनों ग्रह खाना न. 7 में। इनकी शादी बाबी यानि डिम्पल से हुई । दो बेटिओं के जन्म के बाद बुध ने सूरज की मदद से शुक्र को खराब कर दिया। लिहाज़ा बाबी छोड़ कर चली गई। फिर कैरियर भी खत्म हो गया। आसमान से ज़मीन पर आ गिरे। ’’ज़माने ने मारे जवां कैसे कैसे, ज़मीं खा गई आसमां कैसे कैसे ’’।
आठवीं कुण्डली एक जाने माने ज्योतिषी की है। शादी हुई, औलाद भी हुई मगर औरत का साथ लम्बा न चला। 15-16 साल हो गये दूसरी औरत की तलाश आज भी जारी है। उपाय कर लेना ही बेहतर होगा। शायद कोई बात बन ही जाये। शादी का लड्डू सब खाते हैं। कई बार लड्डू मीठा नही निकलता। समझदार के लिए इशारा ही काफी और नकलचीन से बस मुआफी।


Wednesday, August 23, 2017

प्रियंका

कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी ने मुल्क को आज़ादी दिलवाई थी। आज़ादी के बाद कांगे्रस ने मुल्क पर लम्बे अर्से तक हकूमत की और एक ही परिवार के तीन वज़ीर-ए-आज़़म दिये। इसी परिवार के राहुल गांधी को कांग्रेस में अगले वज़ीर-ए-आज़़म के तौर पर देखा और सन् 2014 में लोकसभा का चुनाव उसकी कियादत मंे लड़ा। मुल्क पर कांग्रेस की पकड़ कुछ तो पहले ही ढीली पड़ गई थी बाकी कमी लोकसभा के इन्तख़ाब ने पूरी कर दी। पार्टी की गिनती इतनी कम हो गई कि उसको मुख़ालिफ पार्टी का दर्जा भी न मिला तब राहुल गांधी की उम्र 44 साल थी और चुनाव में सीटें भी 44 मिलीं। कांग्रेस का इतना बुरा हाल पहले कभी न हुआ था। कुछ कांग्रेसी लीडरों ने गांधी परिवार की दूसरी सदस्य, राहुल की बहन प्रियंका को सियासत में लाने की बात की तांकि कांग्रेस की गिरती साख को बचाया जा सके। इस साल 5 सूबाई सरकार के इन्तख़ाब में भी कांग्र्रेस को काफी धक्का लगा। पार्टी केवल एक सूबे में ही सरकार बना पाई।
लिहाज़ा प्रियंका की मांग फिर कांग्रेस पार्टी में होने लगी। राहुल गांधी की कुण्डली पर तो पहले बात हो ही चुकी है। अब सवाल यह है कि अगर प्रियंका सियासत में आ जाये तो क्या कांग्रेस को फिर से जीवन मिल पायेगा ? प्रियंका की कुण्डली इस तरह बताई जाती है:-


राहु केतु चन्द्र और शनि का खास योग। बृहस्पत सूरज बुध खाना नम्बर 7, शुक्र खाना नम्बर 9 और खाना नम्बर 1 खाली। किस्मत का हाल झूले की तरह ऊपर नीचे होता रहे। मां वक्त से पहले बेवा या दवाई, डाक्टर, हस्पताल से ताल्लुक बने। सुना है मां बिमार रहती है। अगर यह कुण्डली सही है तो प्रियंका को अपने घर परिवार के बारे सोचना चाहिए। मुल्क का ख्याल रखने के लिए और कई लोग मौजूद हैं। समझदार के लिए इशारा ही काफी और नकलचीन से बस मुआफ़ी।

Wednesday, July 5, 2017

ग्रह चाल

अक्सर ज़िन्दगी में अजीब वाक्यात हो जाते हैं। कई बार काम करने का मौका ही नही मिलता। अगर मौका मिल जाये तो कामयाबी नही मिलती। कई बार तो कामयाबी हाथ से फिसल जाती है यानि मिलकर भी नही मिलती। ऐसे लोगों को कीरो ने चिल्ड्रन आफ फेट भी कहा है। ऐसी कुछ मिसालें दिलचस्पी का सबब होंगी।
आज से लगभग 13 साल पहले जब लोक सभा के चुनाव हुये तो लगता था कि कांग्रेस पार्टी की नेता सोनिया गांधी जी मुल्क की वज़ीर-ए-आज़म बनेंगी। सरकार बनाने के लिए जब वह राष्ट्रपति से मिली तो उनके सचिव ने सोनिया गांधी जी के नाम का पत्र राष्ट्रपति के आगे रखा। लेकिन राष्ट्रपति ने उसको मनमोहन सिंह जी के नाम का पत्र लाने के लिए कहा। इस तरह सोनिया गांधी जी के बजाये मनमोहन सिंह जी वज़ीर-ए-आज़म बन गये जिनके बारे किसी ने सोचा भी न था। उनको दूसरी बारी भी मिली। फिर जब तीन साल पहले लोकसभा के चुनाव हुये तो कांग्रेस ने राहुल गांधी को आगे किया मगर नतीजा मन्दा ही निकला। कांग्र्रेस पार्टी की गिनती लोकसभा में बहुत कम हो गई। इस साल जब उत्तरप्रदेश में चुनाव हुये तो भी राहुल गांधी कुछ न कर सके। कांग्रेस पार्टी बस सिमट कर रह गई।
तामिलनाडू में तो अजब खेल हुआ। अन्ना डी.एम.के. पार्टी की नेता ससीकला सूबे की वज़ीर-ए-आला बनती बनती जेल में पहंुच गई। और भी कई मिसाले हैं जहां सोचा था क्या, क्या हो गया। जैसे एल.के.अडवानी, सुषमा स्वराज, किरण बेदी वगैरह-वगैरह।
अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है ? इनकी कुण्डलियों पर नज़र डालें तो कुछ पता चलता है। सोनिया गांधी जी की कुण्डली में ग्रहण है। राहुल गांधी की कुण्डली में बुध मन्दा ज़हर से भरा हुआ है। ससीकला जी की कुण्डली में भी बुध बहुत मन्दा है। एल.के.अडवानी जी को वज़ीर-ए-आज़म का सपना भी मन्दे बुध ने पूरा न होने दिया। सुषमा स्वराज जी को भी ग्रहण की वजह से धक्का लगा। किरण बेदी जी के साथ भी बुध ने ड्रामा किया। ग्रहो पर नज़रसानी करते हुये कहा जा सकता है कि मन्दा बुध या ग्रहण अक्सर ज़िन्दगी की बाज़ी ही पलट देता है।  मौका निकल जाता है, कामयाबी फिसल जाती है। 

Thursday, May 11, 2017

आरती-2

चार साल बाद दिसम्बर 2016 को जालन्धर ज्योतिष सम्मेलन में आरती से फिर मुलाकात हो गई। अब उसकी उम्र 38 साल हो गई थी। चहेरे पर पहले वाली चमक न थी। पहले वो तरक्की के बारे पूछा करती थी । अब उसने शादी के बारे में पूछा। यानि जब शादी की उम्र थी तो कैरियर का सोचती रही। अब उम्र निकल गई तो शादी के बारे सोचने लगी। नतीजा न कैरियर में कुछ खास हुआ  और न ही शादी हुई। हालांकि वह खुद भी ज्योतिष में दिलचस्पी रखती है और ज्योतिष सम्मेलनों में उठक बैठक भी करती है। मगर अपनी ग्रहचाल को समझ न पाई। ज़िन्दगी बस गुज़र हो रही है। आरती की कुण्डली शायद आपको याद हो।

     जन्मः 7-7-1978





सूरज की उम्र शुरू हुई तो उम्मीदों ने जन्म लिया। चन्द्र की उम्र आई तो उम्मीदें परवान चढ़ने लगी। शुक्र ने और हवा दे दी। बुध की उम्र में उम्मीदें बिखरने लगी। शनि की उम्र आई तो सब मन्सूबांे पर पानी फिर गया। एक खूबसूरत और पढ़ी लिखी लड़की तन्हा हो कर रह गई। ’’ मैंने चांद और सितारों की तमन्ना की थी.......। ’’ किस्मत की कहानी ग्रहों की ज़ुबानी। तफसील के लिए पहला मज़मून देखें। समझदार के लिए इशारा ही काफी और नकलचीन से बस मुआफ़ी। 

Tuesday, April 11, 2017

ग्रह खेल-3

ज़िन्दगी इतफ़ाक है ....... ज़िन्दगी ग्रह खेल है, कल भी ग्रह खेल थी, आज भी ग्रह खेल है। यानि ग्रह खेल के मुताबिक ही ज़िन्दगी चलती है। तामिलनाडू की साबका वज़ीर-ए-आला अम्मा (जय ललिता) के गुज़र जाने के बाद उनकी एक करीबी मोहतरमा शशिकला नटराजन ने अन्ना डी.एम.के. पार्टी पर कब्ज़ा कर लिया। उसकी नज़र सूबे के वज़ीर-ए-आला की कुर्सी पर थी। उसने फरवरी में काम चलाऊ वज़ीर-ए-आला को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। पार्टी ने भी शशिकला को वज़ीर-ए-आला का उम्मीदवार चुन लिया था। मगर इससे पहले बात आगे बढ़े, सुर्पीमकोर्ट में उसके खिलाफ चल रहे आमदनी से ज्यादा जायदाद होने के केस का फैसला आ गया। कोर्ट ने शशिकला को कसूरवार करार देते हुये चार साल की कैद और 10 करोड़ रूपए जुर्माने की सज़ा सुना दी। लिहाज़ा वज़ीर-ए-आला की कुर्सी पर पहुंचने की बजाय वह जेल में पहंुच गई। सोचा था क्या, क्या हो गया। आखि़र ऐसा क्यों हुआ ? यह जानने के लिए शशिकला की कुण्डली का जायज़ा लेना होगा। मेरी नज़र में जो उसकी कुण्डली गुज़री, वह इस तरह है।





कुण्डली में पापी टोला मन्दा है। ज़िन्दगी का हाल झूले की तरह ऊपर नीचे होता रहे। खाना नम्बर 8 में तीनों ग्रहों का असर मन्दा। राज दरबार का योग तो है मगर नेक नही। तालीम अधूरी रही मगर शादी सूबे एक सरकारी अफसर से हो गई। फिल्मों मे दिलचस्पी होने की वजह से अम्मा के करीब आने का मौका मिल गया। करीबी इतनी बढ़ी कि वह अम्मा के घर में परिवार के मैम्बर की तरह रहने लगी। फिर एक दिन अम्मा ने उसे घर से बाहर कर दिया मगर उसने फौरन मुआफी मांग ली और सिलसिला चलता रहा। इस साल के वर्षफल पर नज़रसानी करें तो राज दरबार का योग मन्दा। खाना नम्बर 5 और 10 के ग्रहों का टकराव और नतीजा धोखा हो गया।  लिहाज़ा सरकारी रोटी खाने के लिए वह जेल में पहंुच गई। समझदार के लिए इशारा ही काफी और नकलचीन से बस मुआफी।

Tuesday, March 7, 2017

जवाब

पिछले दिनों जालन्धर के एक वैदिक ज्योतिषी जी ने ’लाल किताब का सच’ वताने की नाकाम कोशिश की। आखिर में उन्होने लिखा कि ’आप अपने अनुभव हम से शेयर करें।’ लिहाज़ा मेरा 30-35 साला लाल किताब का तर्जुबा पेशे खिदमत है।
ज्योतिषी जी ने अपने लेख में पहले इतिहास की बात की। फिर हिन्दु मुस्लिम की बात की और कहा कि लाल किताब हिन्दुओं का ग्रन्थ नहीं है। अगर होता तो संस्कृत या हिन्दी में लिखा होता। उनके मुताबिक यह किताब 12वीं सदी में लिखी गई। इसके उपाय उल्टे पुल्टे हैं। लाल किताब भविष्य बताने में फेल है। पिछले कुछ दशकों से लाल किताब के नाम पर असली नकली साहित्य छपा है। लाल किताब में प्रश्न कुण्डली बनाने का कोई तरीका नहीं है। वर्षफल चार्ट पर कोई पहाड़ा लागू नहीं होता। किताब के उपाय मनघडं़त है। लाल किताब के ज्योतिषी कम पढ़े लिखे हैं वगैरा-वगैरा। और न जाने क्या-क्या कह दिया जैसे लाल किताब से उनकी कोई जाती दुशमनी हो। दरअसल थोड़ा ज्ञान खतरनाक ही होता है। तो क्या उन्होने नकली लाल किताब पढ़ ली ? वर्ना आलिम को इलम में शक क्या है।
लाल किताब 20वीं सदी में उर्दु ज़़ुबान में लिखी गई। ज्योतिषी जी असली किताब नहीं पढ़ सकते क्योंकि उनको उर्दु नहीं आता। यह किताब एक हिन्दु ब्राहम्ण ,पण्डित रूप चंद जोशी जी ने लिखी थी। इसमें हिन्दु देवी देवताओं की तस्वीरें भी हैं। इस लिए यह हिन्दुओं का ग्रन्थ ही हुआ। मुसलमान तो बाहर से फारसी लेकर यहां आये थे। उर्दु का जन्म बहुत बाद में हिन्दुस्तान में ही हुआ। इस लिए यह हिन्दी से कुछ मिलता है। आज़ादी के वाद पंजाब में उर्दु बन्द कर दिया गया। नतीजा आज की नसल को उर्दु नहीं आता। अब उर्दु आता नहीं, असली किताब देखी नहीं तो फिज़ूल बातों की क्या तुक हुई ? अगर बात के पीछे पुख्ता दलील हो तो ठीक लगता है।
वड़े भाई जी से मेरी इल्तिज़ा है कि किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले असली लाल किताब पढ़ें, फिर बात कहें। लाल किताब को इसके नज़रिये से देखना ही मुनासिब होगा न कि पराशरी के नज़रिये से।
कई पराशरी के विद्धवानों से मैने पूछा कि क्या पराशरी पद्धति में उपाय होते हैं ? उन्होने  मुझे ग्रह शान्ति के लिए पूजा-पाठ, दान पुन्य बताया। यानी पराशरी में बाकायदा तौर पर ग्रहों का उपाय नहीं है। अब पूजा पाठ में हजारों रुपयों का खर्चा मगर लाल किताब के उपाय सस्ते में हो जाते हैं। कुछ पराशरी वाले लाल किताब के उपाय करवाते हैं जो उन्होने नकली किताबों से पढ़े होते हैं यानि आधा तीतर आधा बटेर, न छुआरा न बेर। अगर लाल किताब वाले कम पढ़े लिखे हैं तो पराशरी वाले कौन सा ज्यादा पढ़ गये। बस कोई कोई बी.ए. पास है। बात तो मेहनत और समझ की है।
आज लाल किताब इतनी मकबूल हो गई है कि इसके नाम पर नकल/नकली किताबें हिन्दी में धड़ाधड़ बिक रही हैं। बहुत लोग पराशरी छोड़ कर लाल किताब से आ जुड़े हैं। ज्यादातर लोग नकल/नकली किताब से ही काम चला रहे हैं। असली किताब उर्दु वाली तो जैसे गायब ही हो गई। पंजाब में असली लाल किताब तो चन्द लोगों के पास है। मेरी जानकारी के मुताबिक उनको कोई कमी नहीं है। कुछ पराशरी वालों को लाल किताब से ज़रा जलन है। वह असली किताब नहीं पढ़ सकते क्योंकि उनको उर्दु नहीं आता । इस लिए लाल किताब को गलत मलत कहते हैं। ’’खेल नहीं है दाग यारों से कह दो, आती है उर्दु ज़ुबान आते आते।’’ अब न उर्दु आये न लाल किताब भाये।

Monday, February 6, 2017

तैमूर

’’यह चाँद सा रौशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा, यह झील सी नीली आँखे, कोई राज़ हो इनमें गहरा, तारीफ़ करुं कया उसकी, जिसने तुम्हे बनाया...................’’
कश्मीर की कली शर्मीला टैगोर के पोते की जब पैदायश हुई तो उसका नाम तैमूर रखा गया। इस नाम से चैदवीं सदी के लड़ाकू तैमूर लंग का ख्याल आ जाता है जिसने मर्कज़ी एशिया में  कई मुल्कों को फतह करके अपनी सलतनते तैमूर कायम की थी। उसने दिल्ली की तुगलक सलतनत पर भी हमला किया था। तैमूर लंग ने इतिहास में अपना खास मुकाम बनाया। तो क्या यह लड़का भी अपने लिए कुछ खास करेगा ? यह जानने के लिए इसकी कुंडली का ज़ायजा लेना होगा। खबरों के मुताबिक पटौदी परिवार के जानशीन तैमूर का जन्म 20 दिसंबर 2016 को सुबह 7.30 बजे मुम्बई में हुआ। लिहाज़ा कुंडली इस तरह बनी।


सूरज बुध खाना न0 1 और खाना न0 7 खाली। मंगल केतु खाना न0 3 और चन्द्र राहु खाना न0 9 में। शुक्र खाना न0 2, शनि खाना न0 12 और वृहस्पत खाना न0 10 में। नतीज़ा सामने है। सब जानते हैं कि बच्चे का जन्म एक अमीर और शाही परिवार में हुआ जिसका फिल्मों में भी अच्छा खासा मुकाम है। तैमूर लंग ने पैदा होने के बाद अपने लिए सब कुछ किया था मगर तैमूर तो कुछ करके ही पैदा हुआ है। इसे कोई कमी नही। एहतियातन चँद्र ग्रहण का उपाय करते जाना मुनासिब होगा ताकि हाथी माया में नहाता रहे। तैमूर के बाप दादा ने हिन्दु औरत से शादी की थी। तो क्या तैमूर भी यह रवायत ज़ारी रखेगा ? समझदार के लिए इशारा ही काफी और नकलचीन से बस मुआफी। 

Thursday, December 15, 2016

अम्मा

6 दिसम्बर 2016 को अखबार की सुर्खी थी कि तमिलनाडू सूबे की वज़ीर-ए-आला जयललिता जी का हस्पताल में 75 दिन तक ज़िन्दगी मौत की लड़ाई लड़ते हुये दिल का दौरा पड़ने से इन्तकाल हो गया। लाखों लोग जो उनको एहतिराम से अम्मा कहते थे, सदमें में डूब गये। उनकी दुआ ज़िन्दगी का दरवाज़ा खटखटा कर वापिस लौट आई थी। ख़बरोें के मुताबिक हस्पताल का बिल 80 करोड़ रूपए बना।
ललिता जी का जन्म रियासते-ए-मैसूर में सन् 1948 में हुआ था। बाप बचपन में गुज़र गया तो उनकी परवरिश मां ने की। ललिता जी को छोटी उम्र में ही फिल्मों में काम करना पड़ा। महज़ 17 साला उम्र में जनूब की फिल्मों में उनकी पहचान बन गई। उन्होंने100 से भी ज्यादा तमिल, तेलगू और कन्नड़ फिल्मों काम किया और अपने दौर की दूसरी अदाकारों से ज्यादा उज़रत ली। जनूब की फिल्मों उनके ज्यादातर हीरो थे, शिवाजी गणेशन, एन.टी.रामाराव, एम.जी.आर.वगैरह । बाॅलीबुड की एक फिल्म ’’इज्ज़त’’ में धमेन्द्र भी उनका हीरो रहा। उनकी तकरीबन 28 फिल्मों के हीरो एम.जी.आर. ही थे। वह उस दौरान सूबे के वज़ीर-ए-आला भी रहे। ललिता जी ने अपना सियासी कैरियर सन् 1982 में एम.जी.आर. की छत्तरछाया में शुरू किया।  दरअसल वह उनको अपना ’’सब कुछ’’ मानती थी। आहिस्ता-आहिस्ता वह उनकी महबूबा भी बन गई। एम.जी.आर. की मौत के बाद पार्टी के जानशीन की जद्दो जहद में उनकी बीवी जानकी को पछाड़ कर वह अन्ना डी.एम.के. की आला लीडर बन गई।
ललिता जी सन् 1991 में पहली बार सूबे की वजीर-ए-आला बनी। सियासी दौर के चलते उन पर रिश्वतखोरी और बईमानी के इल्ज़ाम भी लगे। आमदन से ज्यादा जायदाद के एक केस में बंगलौर की एक अदालत ने सन् 2014 में उनको कसूरवार करार देते हुये चार साला कैद और 100 करोड़ रूपया जुर्माने की सज़ा सुना दी। लिहाज़ा उनको इस्तेफा देना पड़ा। बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट से बरी होने के बाद वह फिर वज़ीरे-ए-आला बन गई। तकरीबन 30 साल तक वह जनूबी भारत की सियास्त पर छाई रही। मरने के बाद उनको एम.जी.आर. के पास ही दफनाया गया। ललिता जी ने 114 करोड़ रूपए की जायदाद छोड़ी। मगर उनकी वसीयत के बारे अभी कुछ पता नही चला। ऐसी खूबसुरत व कामयाब अदाकारा और आला सियासी लीडर की कुण्डली दिलचस्पी का सबब होगी।

मेरी नज़र में जो उनकी कुण्डली गुज़री वह इस तरह हैः




जन्म कुण्डली के केन्द्र में दो ग्रह। चन्द्र मंगल खाना नम्बर 3, सूरज बुध खाना नम्बर 9 और केतु खाना नम्बर 5 से उनका कैरियर परवान चढ़ा। बृहस्पत शादी में रूकावट मगर शुक्र ने शनि से मिलकर अपना फल दिया। मिर्ज़ा हल्का सारंगी भारी जो दूसरे के मर्द को निकाल कर ले जावे जो उसने कर दिखाया। वह अपने महबूब की बिन ब्याही बीवी बनी। राहु खाना न0 11 मन्दा जिसने उनको अदालत और जेल दिखाई। वर्षफल में शुक्र और पापी टोला मन्दा और खाना न0 3 खाली। नतीजा नक्कारा-ए-कूच बज उठा और ललिता जी दुनिया-ए-फानी से विदा हो गई। मगर उम्दा ग्रहों की बजह से मौत के बाद भी उनको बहुत एहतिराम मिला। सूबे की हकूमत में मर्कज़ी हकूमत से उनके लिए भारत रतन की मांग की है। समझदार के लिए इशारा ही काफी  और नकलचीन से  बस मुआफी।

Thursday, December 1, 2016

शुक्र-राहू

शुक्र-राहू मुश्तरका होने पर फूल तो होंगे मगर फल न होगा। शुक्र की गाये , राहू के हाथी से परेशान ही होगी। जनूबी दरवाजे वाले मकान का साथ हो ता शुक्र का फल मन्दा ही होगा। लाल किताव में शुक्र को औरत और दौलत  कहा गया है। इस लिए राहु का मन्दा असर औरत, दौलत या दोनो पर होगा। शुक्र की दूसरी अशिया भी मन्दे असर से बरी न होगी।
दोनो मुश्तरका के वक्त राहु की मन्दी निशानी नाखुन से शुरु होगी। ऐसा मर्द, औरत अपने नाखुन कटवाने की वज़ाए बड़ा कर उन पर रंग वगैरा करने का शौकीन होगा या राहू शनि की एजंसी में रहने की कोशिश करेगा यानी चमकीले शानदार सुरमें, आंखों की मश्क से वातों का फैसला कर लेना आम होगा। जिसका नतीजा राहू का राजधानी या ऐसे प्राणी की 43 साला उमर तक उसके लिए ज़माने में हर तरफ कड़वे धुऐं के बादल खड़े कर देगा। जिसकी वजह से रात की नींद अमूमन हराम होगी। चन्द्र और शुक्र दोनो का मुश्तरका उपाओ यानी दूध में मक्खन या नारियल का दान मुबारक होगा। औरत के दाऐं हिस्से पर चांदी का छल्ला नेक असर देगा । मिसाल के तौर पर नीचे दी गई कुंडलियां दिलचस्पी का सबव होंगी।

                                                             जन्मः  6-5-1969


जन्म 29.10.1977


दोनो कुंडलियांे में शुक्र-राहु मुश्तरका है। साथ में सूरज ग्रहण भी है। पहला कारोबारी तो दूसरा मुलाज़िम है। दोनो शादी शुदा हैं । पहली कुंडली में खाना ऐ औलाद रौशन है तो दूसरी कुंडली में फक्त रौशनी पड़ रही है। दोनो को 45 साला उमर तक कोई न कोई तंगी रहे और मेहनत करनी पड़े । मगर 48 साला उमर तक हालात बदल जावें। 50 साला उमर में वृहस्पत खड़ा हो जावे और हालात वेहतर हो जावें । वैसे दोनो की लाल किताब में दिलचस्पी है। पहली कुंडली के लिए खाना न. 4, 8, 9 और दूसरी कुंडली के लिए खाना न. 1, 2 के ग्रहों का उपाओ मददगार होगा। समझदार के लिए इशारा ही काफी है और नकलचीन से बस मुआफ़ी।

Monday, October 10, 2016

यादें

साहिर लुधियानवी का एक शेयर है, ’’दुनिया ने तजुरवातों हवादिस की शक्ल में, जो कुछ दिया है मुझको लौटा रहा हूं मैं’’। ज़िन्दगी के तजुर्बे आदमी के दिल पर छाप छोड़ ही जाते हैं। पण्डित जी के इन्तकाल के बाद मैं लाल किताब के किसी जोतिशी की तलाश करने लगा। वैसे पण्डित जी की कमी कोई पूरी तो नही कर सकता था लेकिन तबादला-ए-ख्यालात के लिए कोई समझदार मिल जाये तो अच्छा। लिहाज़ा मैने शहर के जोतिश प्रेमियों से मिलना जुलना शुरू कर दिया। एक दिन किसी ने बताया कि शहर में एक बुड्ढा जोतिशी है। उसके पास कोई लाल पीली किताब है। जिससे वह लोगों को मूर्ख बनाता है। मैं चुपचाप सुनता रहा। बाद में मैने उस से जोतिशी अता-पता पूछ लिया। लोग उसे ज्ञानी जी कहकर बुलाते थे।
एक दिन मैं ज्ञानी जी के घर पहुंच गया। वह किसी का टेवा देख रहे थे। जब टेवे वाला चला गया तो उन्होंने मेरे आने की वजह पूछी। मैने बताया कि लाल किताब मझे आप के पास ले आई है। कुछ देर किताब की बातें होती रहीं। जब मैं वापिस आने के लिए उठा तो उन्होंने कहा कि आप आते रहिएगा। इस तरह मैं उनके पास आने जाने लगा। एक दिन वो भी मेेरे घर आये और उन्होंने मेरी किताब भी देखी। वक्त के चलते उनसे दोस्ती हो गई। इतवार को मैं एक आध घण्टा उनके साथ बिताने लगा। अक्सर लाल किताब के किसी न किसी पहलू पर बात हो जाती थी। ज्ञानी जी भी मेरी तरह पण्डित जी को अपना रहबर मानते थे। हालांकि वह पण्डित जी से कभी मिले न थे। वह ज्यादा पढ़े लिखे तो न थे पर लाल किताब पर उनकी पकड़ थी जिसकी वजह शायद उनका शौक और उर्दू ज़ुबान की जानकारी थी। शहर के कई जोतिशी लोग उनकी बुराई करते थे। मगर मैंने उनको किसी की बुराई करते नही देखा। ऐसी बात वह हंसकर टाल देते थे। सात-आठ बरस कब गुज़र गये, पता ही न चला।
एक दिन जब मैं ज्ञानी जी के घर पहुंचा तो वह किसी सोच में डूबे हुये थे। मैंने बातचीत शुरू की। उन्होंने कहा, ’’मेरे लिए कोई काम बताओ। अब मेरे पास ज्यादा समय नही रहा’’। उनकी बात सुनकर मैं हैरान रह गया। कुछ महीने बाद ही अचानक उनका इन्तकाल हो गया। शायद उनको अपनी मौत का अन्दाज़ा हो गया था। यह सन् 1989 की बात है। ज्ञानी जी की कुण्डली दिलचस्पी का सबब होगी।
                                        जन्मः  18-6-1920




उनकी शुरू की ज़िन्दगी में तो मेहनत मुशकत ही रही। मगर 50 साला उम्र तक वह एक कामयाब जोतिशी बन गये थे। दौलत और शोहरत का साथ था। अख़बार में जोतिश पर माहवार मजमून भी लिखा करते थे। अंग्रेज़ आलिम बेकन के मुताबिक लिखना आदमी को मुकम्मल बना देता है। ज्ञानी जी एक मुकम्मल आदमी थे। उनकी कामयाबी का राज़ मेहनत ही था। मगर आज मेहनत का ज़माना नही रहा। अब तो नकल और नकली किताबों से काम चल जाता है।