Sunday, March 3, 2019

बातें लाल किताब की

19वीं सदी में अंग्रेज मुल्क पर काबिज हो गए थे। लिहाजा अंग्रेजी दवा का चलन शुरू हुआ। देशी हाकिमों ने अंग्रेजी दवा की बुराई की। मगर 20वीं सदी में अंग्रेजी दवा की पकड़ मजबूत हो गई और देशी दवा दूसरे दर्जे पर चली गई। आज अंग्रेजी दवा अपनी खूबी की वजह से पहली पसंद बन चुकी है। ठीक इसी तरह 20वीं सदी में लाल किताब वजूद में आई। 21वीं सदी में आते आते लाल किताब अपनी खूबी की वजह से कायम हो गई। आज लाल किताब के नाम पर हिंदी में नकल/नकली किताबें बाजार में धड़ाधड़ बिक रहीं हैं। असली किताब जो उर्दू में लिखी गई थी कम ही नजर आती है। इसकी एक वजह यह है कि आज की पीढ़ी को उर्दू नहीं आता। फिर भी नकल /नकली किताबों से कई लोग रोजी रोटी चला रहे हैं।
जिस तरह अंग्रेजी सिस्टम में सर्जरी होने की वजह से वह देशी सिस्टम पर छा गई , उसी तरह लाल किताब ग्रहों के उपाय की वजह से पराशरी पर छा गई। लिहाजा पराशरी के कई विद्वानों ने लाल किताब को अपना लिया चाहे उनके पास असली किताब नहीं है। तो कुछ लोगों ने पराशरी के साथ लाल किताब के उपाय जोड़ लिए यानि आधा तीतर आधा बटेर न छुआरा न बेर। मगर कुछ आज भी लाल किताब की बुराई कर रहे हैं। यह वह लोग हैं जिन्होंने असली किताब कभी देखी ही नहीं। देख भी लें तो भी क्या है? वह इसे पढ़ ही नहीं सकते क्योंकि उनको उर्दू नहीं आता। बस वह तो बिना वजह लाल किताब में नुक्स निकाल रहे हैं। फिजूल के वीडियो बना कर यू- ट्यूब पर डाल रहे हैं। ऐसी बातों से लाल किताब को कोई फर्क नहीं पड़ता। हाँ ऐसे लोगों पर हँसी जरूर आती है। किताब को तो पढ़ नहीं सकते खामख्वाह नुक्ताचीनी कर रहे हैं।
चंद लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने किताब के लिए उर्दू सीखा। फिर रफ्ता रफ्ता मेहनत करके किताब को पढ़ा समझा और कुछ सीखा। आज कुछ नौजवान लड़के किताब के लिए उर्दू सीख रहे हैं मुझे उनसे बहुत उम्मीद है। आने वाले वक्त में वह लाल किताब को और भी बुलंदी पर लेकर जायेंगे। मेरी दुआऐं उनके साथ हैं। वैसे भी पुराने सिस्टम को नया सिस्टम बदल देता है। आज जोतिश का नया सिस्टम है लाल किताब।