Tuesday, January 19, 2016

चन्द्र-शनि

"पहाड़ शनि मैदान चन्द्र का, कोहसार समन्द्र बनता हो, 
 एक  भला  तो  दूसरा मन्दा, मौत  बहाने घड़ता हो।’’
दोनों मुश्तर्का में अन्धा घोड़ा या दरिया में बहता हुआ मकान, एक भला तो दूसरा मन्दा होगा। इस तरह दोनों का फल ख़राब होगा। दोनों 44 सालां उम्र तक मुश्तर्का होंगे और मस्नूई नीच केतु का असर होगा। जहां सनीचर का असर उम्दा होगा, उसमें 1/3 चन्द्र का मन्दा फल होगा। जहां चन्द्र उम्दा होगा वहां सनीचर का बुरा असर साथ होगा। दूध में ज़हर, माली हालत के लिये खाना नम्बर 10 का फल लेंगे। ख्वाह दोनो किसी भी घर में इकट्ठे बैठे हों।
इन्सानी दिल (चन्द्र) औरत की शरारती आंख की लहर या इशारा और गेसू, सनीचर के कामों से ही मौत ढूंढता फिरे। इश्क बाइसे तबाही होगा। उसका धन औरत खानदान (ससुराल) या दूसरे यार दोस्त और गैर हकीकी भाई बन्दो के काम आवे।
जब कभी चन्द्र के दुश्मन ग्रह तख्त पर आवें  चोरी या धन हानि होगी। सनीचर के काम, रिश्तेदार या अशिया मुताल्लिका सनीचर दुख का सबब होंगे। स्याह मुंह बदनाम करने वाली माया होगी यानि उसका खालिस चांदी का रूपया हर तरह से खोटा और स्याह, बदनामी की वजह होगा। उसके ठण्डे मीठे पानी के कुंए में काली स्याह ज़हर मिली हुई होगी। सनीचर के मकान आराम देने के बजाये दुख का बहाना होंगे। सनीचर की उदासी और वैराग दिल को शान्ति देने की बजाये उल्टा उसको जलाते होंगे। अगर चन्द्र उम्दा धन तो सनीचर ऐसा मन्दा ख़जानची होगा जो ज़रूरत के वक्त मालिक को रूपया निकालने न देगा या ऐसे टेवे वाले की अपनी कमाई अपने काम न आयेगी। स्याह मुंह बदनाम करने वाली माया का मालिक होगा। सनीचर या चन्द्र की दो रंगी अशिया बृहस्पत और केतु के जानदार और बेजान चीज़ों का फल मन्दा करेगी।
ऐसी हालत में सांप को दूध पिलाना मुबारक होगा। चन्द्र ग्रहण के वक्त सनीचर की अशिया चलते पानी, नदी या दरिया में बहाना मददगार होगा। दोनो ग्रहों की बाहमी मन्दी हालत, राहु के बचाव के लिए सूरज का उपाओ मददगार होगा। मगर कुण्डली के बाकी ग्रहों को भी देख लेना बेहतर होगा। मिसाल के तौर पर एक आदमी की कुण्डली जो दिलचस्पी का सबब होगी।

चन्द्र शनि मुश्तर्का खाना नम्बर 1 मस्नुई केतु बना मगर नीच। कुण्डली वाले का जद्दी मकान को लेकर परिवार में झगड़ा हुआ और अदालत तक पहुंचा। फिर घर को तोड़ फोड़ कर दोबारा बनाना पड़ा। घर में एक बार चोरी भी हुई। बेटा पैदा होने के बाद रीढ़ की हड्डी की तकलीफ शुरू हुई। लिहाज़ा बिस्तर पर आ गये और साल बाद आप्रेशन करवाना पड़ा। बेटा भी ठीक नही केतु नीच का असर। इसलिए उसकी पढ़ाई लिखाई न हो सकी। उसको सहारे की ज़रूरत है। अब वह बड़ा हो गया है और कुण्डली वाला बूढ़ा हो गया। चन्द्र शनि मुश्तर्का का मन्दा असर साफ ज़ाहिर है। समझदार के लिए इशारा ही काफी और नकलचीन से बस माफी।

Thursday, December 17, 2015

हमशीरा

लाल किताब का एक शेयर है, ’’ समां करे नर क्या करे, समा बड़ा बलवान; असर ग्रह सब पर होगा, परिन्द पशु इन्सान।’’ कहते हैं  जब खुदा भी इन्सानी जामे में ज़मीन पर आया तो ग्रहों का असर उस पर भी हुआ। ग्रहों के इस खेल को किसी ने वक्त कहा तो किसी ने किस्मत। फिर किस्मत के जुदा जुदा रंग जुदा जुदा लोगों में देखने को मिलते हैं जिसको जानने के लिए ज़रिया है जोतिश । आइए एक बार फिर ग्रहों का खेल जोतिश की निगाह से देखें।

                               
यह कुण्डलियां दो बहनों की हैं। अब उम्र 40 साल से उपर हो गई मगर बात बहन तक ही अटकी हुई है। बाप बचपन में गुज़र गया और मां वक्त से पहले बेवा हो गई। दोनों के पास सूरत है तालीम है और इंग्लैण्ड में नौकरी है। मगर शादी की अभी तक कोई बात न बनी। तो क्या यह बीवी न बनंेगी ? लाल किताब के मुताबिक गृहस्थ की चक्की खाना नम्बर 7 में चलती है और चक्की को घुमाने वाली कीली खाना नम्बर 8 में होती है। तो क्या चक्की न चलेगी ? आखिर शादी जि़न्दगी का ज़रूरी पहलू है।
पहली कुण्डली में खाना नम्बर 7 में दो ग्रह मगर खाना नम्बर 1 खाली है। दूसरी कुण्डली में खाना नम्बर 1 में दो ग्रह तो खाना नम्बर 7 खाली है। दोनों कुण्डलियों में खाना नम्बर 8 में पापी ग्रह हैं। शुक्र ने शादी का योग न बनाया और मंगल ने भी मंगल गीत न गाये। लिहाज़ा गृहस्थ की चक्की न चली। फिर शादी की उम्र भी निकल गई है। अब क्या फर्क पड़ता है शादी हो या न हो । कारवां गुज़र गया बहार देखते रहे।

Friday, November 13, 2015

छल्ला

जब छल्ले का जि़क्र हुआ तो पुराने सुहाने दिन याद आ गये। वह भी क्या उम्र है जब छल्ला दिया लिया जाता है। शायद कभी आपने भी छल्ला दिया लिया हो। फिल्मी गीतों में भी छल्ले का जि़क्र आता है। जैसे ’’या अंगूठी फैंक अपनी या छल्ला दे निशानी, घर की छत्त पर खड़ी खड़ी मैं हुई शर्म से पानी, ....... फिर क्या हुआ ? ......... अल्लाह अल्लाह अल्लाह वो ले गया चांदी छल्ला।’’ फिर लाल किताब में भी मन्दे ग्रहों की दुरूस्ती के लिए छल्ले का जि़क्र आता है। मसलन् कुण्डली में सूरज शुक्र बुध मुश्तर्का हों तो खालिस चांदी का छल्ला मददगार होगा। लेकिन जब बुध राहु की बात आती है तो छल्ला फौलाद का होगा। छल्ला तो छल्ला है चाहे चांदी का हो या फिर फौलाद का। चांदी तो समझ आती है पर यह फौलाद क्या हुआ ? दरअसल खालिस लोहे को अरबी ज़ुबान में फौलाद कहते हैं।  किताब में छल्ले के साथ बेजोड़ शब्द का भी इस्तेमाल हुआ है। लिहाज़ा छल्ला खालिस और बेजोड़ होना चाहिए जिसको जोड़ या टांका न लगा हो।  
अब छल्ला मिलेगा कहां ? एक सीधा साधा तरीका। चांदी का छल्ला चाहिए तो किसी सुनार के पास जायें। वह खालिस चांदी की शीट से टुकड़ा काट तराश कर छल्ला बना देगा। लेकिन अगर फौलाद का छल्ला चाहिए तो किसी ख़राद वाले के पास जाना पड़ेगा। वह साफ सुथरे लोहे के टुकड़े को ख़राद पर काट तराश कर छल्ला बना देगा। इस तरह छल्ला उंगली के नाप के मुताबिक बनवाया जा सकता है। 
फौलाद का छल्ला अगर अच्छे लोहे से बना हो तो, पहनने के बाद इसे जंग न लगेगा बल्कि कुछ दिन बाद यह सफ़ा और चमकदार होने लगेगा। इसकी चमक किस्मत की सोई हुई लहर को जगा देगी। यह एक कारआमद उपाय है। मगर छल्ला किसी से मुफ़्त न लिया जावे। आखिर इस छल्ले का राज़ क्या है ? 
बुध खाना नम्बर 12 में या बुध राहु मुश्तर्का या फिर जुदा जुदा घरों में मन्दे हों तो फौलाद का छल्ला जिस्म पर मददगार होगा। खाना नम्बर 12 राहु का घर भी है। फौलाद का छल्ला बुध शनि मुश्तर्का है। बुध खाना नम्बर 12 इतना ज़हरीला कि खाना नम्बर 6 के तमाम ग्रहों को बरबाद कर देवे। अक्ल (बुध) के साथ अगर होशियारी (शनि) का साथ नम्बर 2-12 मिल जावे तो ज़हर से मरे हुये के लिए भी आबे हयात होगा जो मुर्दों को भी सर्वजीव कर देवे। अब आप समझ ही गये होंगे राज़ छल्ले का।  

Wednesday, October 14, 2015

तवाजुन

’’इतने बड़े जहां में अपना भी कोई होता, हम भी तो मुस्कराते अपना उसे बनाते’’।
 यह बात है एक 36 साला खातून की, जिसके पास सूरत है, तालीम है और अच्छी नौकरी है। मगर फिर भी जि़न्दगी में तन्हा है। यानि शादी की अब तक कोई बात न बनी। बाप बचपन में गुज़र गया और मां वक्त से पहले बेवा हो गई। एक बड़ी बहन है जिसकी शादी कब की हो चुकी है। भाई कोई है नही। बस एक बूढ़ी मां है जो आज भी उसकी शादी की उम्मीद किये बैठी है। वह चाहती है कि उसकी बेटी को उसके जीते जी कोई अच्छा हमसफ़र मिल जावे। क्या मां की उम्मीद पूरी होगी ? इस खातून की कुण्डली इस तरह है।



कुण्डली के चारो केन्द्र और ऊपर वाले घर खाली हैं। खाना नम्बर 3 भी अब खाली गिना जायेगा। इस तरह सब ग्रह खाना नम्बर 5, 6, 8 और 9 में बैठे हैं। देखा जाये तो कुण्डली में तवाजुन नही है। फिर किस्मत के घर खाना नम्बर 9 में चन्द्र ग्रहण जिसका मन्दा असर पहले मां बाप पर फिर अपने आप पर। शुक्र खाना नम्बर 5 में मंगल बद के साथ तंग और बुध की कोई मदद नही। तो क्या शुक्र का फल जल गया  जो अब तक शादी न हुई ? ग्रहों का अजीब खेल। खैर शुक्र की पालना और ग्रहण का उपाय करने से कोई नतीजा निकल सकता है। लेकिन उपाय (असली) लाल किताब के मुताबिक ही होगा। यह तभी होगा अगर रब्ब दी रहमत हो जावे। समझदार के लिए इशारा ही काफी।

Tuesday, September 8, 2015

गैर मुल्की सफर

कोई ज़माना था जब दूसरे मुल्कों के लोग धन-दौलत के लिए  हिन्दोस्तान आया करते थे। अब यहां के लोग रोज़ी रोटी या काम काज के लिए दूसरे मुल्कों को जाते हैं। इस तरह गैर मुल्की सफर हो जाता है। लाल किताब के मुताबिक समुद्री सफर का मालिक चन्द्र, हवाई सफर का मालिक बृहस्पत और खुश्की के सफर का निगरंा शुक्र है। मगर सब सफरों का हुक्मनामा जारी करने कराने वाला ग्रह केतु होगा। हर किस्म के सफर के लिए ग्रह मुताल्लिका का भी ख्याल रखना होगा।
चन्द्र को सफेद घोड़ा तसव्वुर किया गया है जो दरअसल दरियाई कहलाता है। जब चन्द्र से शुक्र का ताल्लुक हो जावे तो खुश्की का सफर अमूमन होगा। मगर जब चन्द्र का सूरज या बृहस्पत से ताल्लुक हो जावे तो सफर समुद्र पार या गैर मुल्की सफर राज दरबार के काम से होगा। अगर बुध से ताल्लुक हो जावे तो कारोबारी सफर होगा। इस तरह जुदा जुदा ग्रह के ताल्लुक से जुदा जुदा किस्म का सफर होगा।
सौ दिन की मियाद तक का सफर कोई सफर नही गिना जाता। वर्षफल के हिसाब से जब चन्द्र और केतु अच्छे या अच्छे घरों में हों तो सफर के नेक नतीजे होंगे। सफर का फैसला अमूमन केतु के बैठा होने वाले घर के मुताबिक होगा। मसलन् केतु बैठा हो खाना नम्बर 2, 3, 7, 9, 10 में तो आम तौर पर नेक असर देगा। लेकिन खाना नम्बर 8 में बैठा केतु मन्दा असर देगा। बाकी घरों में केतु का असर शक्की ही होगा। बात को समझने के लिए चंद गैर मुल्की सफर वाली कुण्डलियां बतौर मिसाल पेश हैं। समझदार के लिए इशारा ही काफी।


कुण्डली नम्बर 1 एक जोतिशी की है। चन्द्र बृहस्पत खाना नम्बर 1, केतु नम्बर 3 और खाना नम्बर 11, 12 खाली। यह कई बार गैर मुल्की सफर कर चुके हैं।
कुण्डली नम्बर 2 एक मकैनिकल इंजीनियर की है। चन्द्र सूरज खाना नम्बर 4, केतु खाना नम्बर 10, बृहस्पत खाना नम्बर 9 और शुक्र खाना नम्बर 3, कोई लड़की समुन्द्र पार से बुला रही है। लिहाज़ा शादी करके सन् 1987 में अमरीका में बस गये।
कुण्डली नम्बर 3 एक कम्प्यूटर इंजीनियर की है। चन्द्र शुक्र खाना नम्बर 9, केतु खाना नम्बर 4 और बृहस्पत खाना नम्बर 11, पहले मुल्की सफर करते रहे फिर बाद में सन् 2013 में गैर मुल्की सफर पर कैनेडा चले गये। अब वहीं बसने का इरादा है।
कुण्डली नम्बर 4 एक खातून की है। चन्द्र खाना नम्बर 2, सूरज खाना नम्बर 4 और केतु खाना नम्बर 7, इस साल मई में आस्ट्रेलिया चली गई। वर्षफल में केतु खाना नम्बर 8 में मन्दा। लिहाज़ा सफर का नतीजा अच्छा न निकला। इसलिए मन उदास है।
                      आ अब लौट चले, नैन बिछाए बाहें पसारे, तुझको पुकारे देश तेरा...... आ जा रे।

Tuesday, August 11, 2015

शादी ब्याह

पढ़ लिखकर लड़का जब कामकाज पर लग जाता है तो मां बाप उसकी शादी के बारे में सोचने लगते हैं। लड़का भी अपनी सपनो की रानी का इन्तज़ार करने लगता है। मां को भी बहू का चाव होता है। मगर जब बहू आकर थोड़े अर्से में ही लड़के की खटिया खड़ी कर देती है तो सपनो की रानी अक्सर गम की कहानी बन जाती है। फिर, टूटे हुये ख्वाबों ने हमको यह सिखाया है, दिल ने जिसे पाया था आंखो ने गंवाया है या फिर कोई मुझ से पूछे कि तुम मेरे क्या हो, वफा जिसने लूटी वो ही बेवफा हो। ऐसा ही कुछ कुण्डली नम्बर 1 वाले लड़के के साथ हुआ।
   








पिछले साल लड़के के बाप ने बताया कि उसने बेटे की शादी बड़ी धूमधाम से की थी। मगर सब गड़बड़ हो गया। बात बिगड़ती बिगड़ती अदालत तक पहुंच गई। अब इतने तंग हो गये कि पीछा छुड़ाना चाहते हैं।  पर लड़की वाले तलाक के लिए मोटी रकम मांग रहे हैं। जिससे मेरा तो दीवाला ही निकल जायेगा। आपके बारे में पता चला तो आपके पास आया हूं। मैने कहा चलो शनि की अदालत में अपील कर देते हैं। देखते हैं फिर क्या होता है? उसने कहा कि फैसला तो अभी हुआ नही तो अपील कैसी ? मैने उसको बताया कि मैं दुनियावी अदालत की बात नही कर रहा । यह ग्रहों के अदालत है। एक उपाय करना होगा जिस पर कोई खर्चा नही होगा। मैने उपाय बता दिया मगर उसने कहा कि वह यह उपाय नही कर सकता। मैने कहा चलो जैसे आपकी मजऱ्ी।
तकरीबन एक महीने के बाद उसने फिर मुझसे बात की। उसने कहा कि वह उपाय करने के लिए तैयार है। मैने कहा तो फिर कर लो भई। उपाय कर दिया गया। रफ्ता रफ्ता केस का रूख बदलने लगा। इस साल के शुरू में फैसला हो गया। छोटी रकम देकर उसका छुटकारा यानि तलाक हो गया। इसी दौरान मुझे किसी ने बताया कि वह आदमी खुद जोतशी है और जोतिश सिखाता भी है।
कुछ दिन पहले उसने फिर बात की। उसने बताया कि वह बेटे की दूसरी शादी करना चाहता है। मैने कहा ठीक है भई कर लो। उसने मुझे कुछ लड़कियों की कुण्डलियां (नम्बर 2 से 6) दिखाते हुये कहा कि वैसे तो इन कुण्डलियों का लड़के की कुण्डली से मिलान होता है पर मैं आपकी राय लेना चाहता हूं। मैने उन कुण्डलियों पर एक नज़र डाली और पूछ ही लिया कि क्या यह लड़कियां कुंवारी हैं ?  उसने कहा नही, सब तलाकश्ुादा हैं। मैने कहा कि आप खुद फैसला क्यों नही लेते ? आप भी तो जोतिश के विद्वान हैं। वह सोच में पड़ गया।
उसके ज़ोर डालने पर मैने कहा कि आप ने बेटे की कुण्डली पहले भी तो मिलाई थी पर नतीजा क्या निकला ? शादी ब्याह आमतौर पर सातवें घर से देखा जाता है। इन सभी कुण्डलियों में सातवें घर में गड़बड़ है। लड़के की कुण्डली में भी यही हाल है। नतीजा आपके सामने है। सभी का तलाक हुआ। शादी खाना बरर्बादी बन कर रह गई। तो उसने निराश हो कर पूछा तो फिर मैं क्या करूं ? मैने जवाब दिया कि पहले खाना नम्बर 7 की दुरूस्ती करो फिर शादी के बारे सोचना । यह दुरूस्ती (असली) लाल किताब के मुताबिक ही होगी।
कई बार मैं सोचता हूं कि क्या हर कोई डाक्टर बन सकता है ? क्या हर कोई इंजीनियर बन सकता है ? क्या हर कोई शायर बन सकता है ? क्या हर कोई जोतशी बन सकता है ? शायद नही। आज कई लोग जोतिश सिखा रहे हैं। कुछ माहिर  लाल किताब पढ़ा रहे हैं। क्या वह खुद लाल किताब पढ़ सकते हैं ?

Monday, July 6, 2015

अपनी बात-2


पुरानी बात है कालेज के दिनों की। अदीबो की महफि़ल में बैठना अच्छा लगता था। एक बार ऐसे ही हम कुछ लड़के किसी अदीब की महफि़ल में बैठे थे। बात टैगोर की किताब ’’गीतांजलि’’ की चली। एक लड़के ने कहा कि उसने किताब पढ़ी मगर उसे यह समझ नही आया कि उस पर नोबल प्राईज़ क्यों दिया गया। तब उस अदीब ने कहा कि तुमने किताब हिन्दी में पढ़ी होगी। मैने यह किताब बंगला में पढ़ी क्योंकि यह बंगला में लिखी गई थी। लुत्फ आ गया। मैने पूछ लिया कि क्या आपको  बंगला भी आती है। तो उन्होने जवाब दिया कि किताब पढ़ने के लिए बंगला सीखी थी। मैं सोच में पढ़ गया। कुछ दिनो बाद मुझे उनके एक दोस्त से मिलने का मौका मिला। मैने उनसे ’’गीतांजलि’’ वाली बात की। उनके दोस्त ने बताया कि वह बहुत लाइक़ आदमी है। उसने तो ’’चन्द्रकांता’’ किताब पढ़ने के लिए हिन्दी भी सीखी थी। मैं हैरान रह गया कि एक किताब के लिए आदमी कैसे नई ज़ुबान सीख लेता है।
कुछ साल बाद जब मुझे लाल किताब मिली तो मैने भी किताब पढ़ने के लिए उर्दू सीखना शुरू कर दिया। कुछ अर्से बाद रफ्ता-रफ्ता उर्दू पढ़ने लगा मगर लाल किताब पढनी़ फिर भी मुश्किल थी। मगर वक्त के साथ साथ मश्क होती गई और उर्दू पर मेरी पकड़ बन गई। फिर लाल किताब पढ़ने समझने में कोई मुश्किल न रही। दिल को एक तसल्ली महसूस होने लगी। मगर आज वक्त बदल गया है। हर आदमी जल्दी में है। आगे बढ़ने के लिए छोटा रास्ता चाहता है। मेहनत के लिए वक्त भी नही है। फिर लाल किताब के नाम पर हिन्दी में कई किताबें बाज़ार में आ गई हैं। लोग भी समझदार हो गये हैं। हिन्दी वाली किताब खरीदते है और एक दो साल में लाल किताब के माहिर बन जाते हैं। फिर बड़े बड़े दावे करने लगते हैं। कुछ तो दूसरों पर नुक्ताचीनी भी करते हैं। एक बार धर्मशाला जोतिष सम्मेलन में एक आदमी ने लाल किताब के मुताबिक कोई बात कही मगर दूसरे ने उसकी बात काट दी। उसने कहा कि किताब में ऐसा नही लिखा। किसी ने मुझसे पूछ लिया कि दोनो में ठीक कौन है । मैने जवाब दिया कि दोनो ठीक हैं। पर उसकी तसल्ली न हुई उसने फिर वही सवाल किया। मैने जवाब दिया कि जो जिसने पढ़ा वो कह दिया। वो बोला मैं समझ गया कि असली किताब दोनो ने नही पढ़ी।
अंग्रेज़ी में एक कहावत है पहले काबिल बनो फिर उम्मीद करो। मगर आज लोग उम्मीद ही करते है। अगर उनकी बात मान ली जाए तो खुश नही तो खफा हो जाते हैं। एक बार लुधियाना जोतिष सम्मेलन में एक सज्जन ने बताया कि उनको लाल किताब की हूबहू कापी हिन्दी में मिल गई है। गलती से मैने पूछ लिया आपको कैसे पता चला कि यह हूबहू असली किताब की कापी है । बस वह खफा हो गये। इसी तरह एक बार जालन्धर में एक सज्जन ने बताया कि वह पराशरी और के.पी. के माहिर हैं और लाल किताब का माहिर बनने के लिए मेरी मदद चाहते हैं। मगर मैने कहा कि मैं तो कोई माहिर नही हूं फिर आपकी क्या मदद कर सकता हूं। वह सज्जन भी खफा हो गये। एक मुहतरमा मेरे घर तक पहुंच गई। वह लाल किताब देखना चाहती थी। खैर मैने लाल किताब का पूरा सैट उसके आगे रख दिया। शायद उसने अपनी तसल्ली की। बाद में एक सम्मेलन में वह पांच-सात साथियों के साथ मुझसे मिली। वह चाहती थी कि मैं उनको लाल किताब जोतिष सिखा दूं। मगर मैने कहा कि मैं तो खुद सीख रहा हूं। उसे मेरी बात अच्छी न लगी। उसने कहा कि यहां तो ऐसे आदमी लाल किताब जोतिष पढ़ा रहे हैं जो खुद लाल किताब पढ़ नही सकते।
इसी तरह एक बार चार-पांच लोग मुझसे मिले । उन्होने बताया कि वो लाल किताब पर रिसर्च करना चाहते हैं जिसके लिए उनको मेरी मदद चाहिए। मैने पूछ लिया कि क्या आपके पास असली किताब है तो उन्होने बताया कि उनके पास हिन्दी वाली किताबे है तो मैने कहा कि रिसर्च तो असली किताब पर होती है। वह भी मुझसे खुश न हुये। एक आदमी ने तो हद ही कर दी। उसने मुझसे पण्डित जी की कुण्डली मांग ली। मैने उसकी मांग नज़र अन्दाज़ कर दी। बस फिर क्या था वह मेरे खिलाफ हो गया और लोगोें में मेरी बुराई करने लगा। उसको उर्दू तो आता नही मगर नकली किताब के बल बूते पर खुद को लाल किताब का माहिर समझता है। दरअसल कुछ लोगों को अपने दुख का इतना दुख नही होता जितना दूसरों के सुख का दुख होता है।
इतने साल गुज़र गये मैं आज भी लाल किताब का तालिबे इल्म हूं। मगर कुछ लोग तो नकली किताबें पढ़कर एक दो साल में लाल किताब के माहिर बन बैठे। मैं उनकी काबलियत को सलाम करता हूं। मैं मश्कूर हूं उन अदीबों का जिनसे मैने बहुत कुछ सीखा। मैं मश्कूर हूं उन हबीबों का जिन्होने मेरी हौसला अफज़ाई की। मैं मश्कूर हू उन रकीबों का जिन्होने मेरा चर्चा किया और मेरी नकल करके मेरा रूतबा बढ़ा दिया।