Saturday, June 27, 2020

राजपूत

पिछले दिनों खबर आई कि अदाकार सुशांत सिंह राजपूत ने महज़ 34 साला उम्र में ख़ुदकुशी कर ली जो फ़िल्मी दुनिया के लिए किसी झटके से कम न थी। मगर यह कोई नई बात नहीं। इससे पहले अदाकार गुरुदत्त , दिव्या भारती , जिया खान वगैरह ने ख़ुदकुशी की थी। दिव्या भारती की उम्र तो फकत 19 साल थी।।
राजपूत ने अपना कैरियर टीवी से शुरू किया। फिर 2013 से फिल्मों में आ गए। उनकी फ़िल्में चलने लगीं। एक फिल्म के लिए अवॉर्ड भी मिला। फिर ख़ुदकुशी .............ऐसा क्या हुआ? यह जानने के लिए अदाकार की कुण्डली का जायज़ा लेना होगा। नैट पर जो उनकी कुण्डली मिली वो इस तरह है



अब कुण्डली कितनी सही है , कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह बहुत कुछ कह रही है।
        "हाथी बैठा तख़्त पर ,तो तख़्त थर्राने लगा
          सूरज बैठा जिस घर में ,ग्रहण वां आने लगा"
राहु खाना नं 1 और 10 में बृहस्पत सूरज शुक्र बुध। नौकरी या फिल्मों से कोई ताल्लुक। ग्रहण की वजह से लम्बी उम्र या कैरियर का कोई भरोसा न हो। मंगल केतु मुश्तर्का खाना नं 7 , शेर और कुत्ते की लड़ाई। भाई की उम्मीद नहीं पर बहन जरूर हो। चंद्र खाना नं 2 और शनि खाना नं 8 मन और माँ पर मंदा असर , या माँ का साथ लम्बा न चले और मन पर बोझ बने।
इस साल पर नज़र डालें तो खुद ही खुद के दुश्मन हो गए। मंगल बद और पापी ग्रह शनि राहु केतु मंदे। उम्र का मालिक चंद्र खाना नं 10 में रद्दी और शनि का खाना नं 5 से टकराव। राहु खाना नं 8 खूनी हाथी मौत का हुकुमनामा साथ लिए , खुद ही अपनी मौत का नक्कारा बजा दिया। बुध खाना नं 3 कोढ़ी ने दुनिया से चले जाने का रास्ता खोल दिया। लिहाजा वक्त से पहले कूच कर गए। ओम शान्ति। ख़बरों में ख़ुदकुशी की वजह डिप्रेशन बताई गई। मगर वह कौन ..........जिसने ज़िन्दगी की दिशा ही बदल दी।

Tuesday, October 22, 2019

ग्रहस्थी चक्की


             ‘‘आकाश ज़मीन दो पत्थर 7वें, रिज़क अकल की चक्की हो।
               दोनों घुमावें कीली लोहे की, घर आठवें जो होती हो।।’’

लाल किताब के मुताबिक ग्रहस्त की चक्की कुण्डली के खाना नं0 7 में चलती है। चक्की के नीचे वाला पत्थर शुक्र (रिज़क) और ऊपर घूमने वाला पत्थर बुध (अकल) है। चक्की घुमाने वाली लोहे की कीली खाना नं0 8 में होती है। शुक्र बुध मुश्तर्का मुबारक होंगे। वर्ना बुध के बिना शुक्र बेचैन ही होगा।
जन्म अस्थान, जहान का वासी, शुक्र की चीज़े, शादी, जायदाद (मकानात वगैरह), जाहिर दारी, जिस्म की जिल्द, जिस्म के मुसाम, हथेली की हर हालत का हाल, सुभाओ गर्म तर बादी, औरत, लड़की, बहन, बुध की चीजे़, पोती, चेहरे की चमक या रंग, गाय, पिस्तान, स्त्री घर, लड़कियों के रिश्तेदारों के घर, मिट्टी के ज़र्रे, पलस्तर या सफेदी मकान, मकानात का बनना, अण्डों से पैदा होने वाले परिन्दे, रूहानी ताकत मुताल्लका बुध शुक्र, कबीले की पैदाइश व परवरिश, पराई दौलत का मिलना बज़रिया बुध की नाली, नस्ल दर नस्ल व्यापार, गौयाई, कुवते वाह, अन्दुरूनी अकल दुनियावी ताल्लुक में, वक्त जवानी, मैदान दुनिया, जायदाद के लिए साथ लाये खजाने, जनूब मगरिब, दही, रंग सफेद, बुध फूल, शुक्र बीज, शुक्र बुध जैसे हो वैसा ही हाल होगा। यह सहन है खाना नं0 1 का और सेहन का मुंसिफ होगा मंगल। इस खाने मे सनीचर उच्च, सूरज नीच और शुक्र बुध पक्की हालत के ग्रह होंगे। घर का मालिक और किस्मत को जगाने वाला ग्रह शुक्र ही होगा। मर्द की कुण्डली में शुक्र उसकी बीवी और औरत की कुण्डली में शुक्र उसका शौहर होगा। मिसाल के तौर पर कुछ कुण्डलियां दिलचस्पी का सबब होंगी।





कुण्डली नं0 1 राहुल गांधी जी की है। खाना नं0 7 यानि वजीरी घर खाली और उसका मालिक शुक्र खाना नं0 2 में। स्कूल मिस्ट्रैस हर एक की दिलदादा औरत मगर खुद किसी को पसन्द न करे। खाना नं0 1 में दो ग्रह यानि तख्त पर राजे दो मगर वजीर एक भी नहीं। फिर बुध की भी कोई मदद नहीं। अब उम्र 50 साल के आस-पास हो गई है। न ग्रहस्ती चली और न ही सियासत।
कुण्डली नं0 2, फिल्मी अदाकार की बेटी ऐकता कपूर जी की है। खाना नं0 7 खाली और उसका मालिक शुक्र तख्त पर यानि खाना नं0 1 में शक्की। शुक्र का पतंग...उठती जवानी के वक्त खूबसूरती की रंग बिरंगी, दिल फरेब हुस्न की दिलचस्प और दिलरूबा सिफतों की मीठी मीठी ज़ुबान से तारीफ़ करते कराते, सोये हुए मीलों निकल गये। बुध की कोई मदद नहीं। अब उम्र 45 साल के आस-पास हो गई है।
फिल्मी चक्कर तो चल रहा है मगर ग्रहस्ती चक्की न चली।

Sunday, March 3, 2019

बातें लाल किताब की

19वीं सदी में अंग्रेज मुल्क पर काबिज हो गए थे। लिहाजा अंग्रेजी दवा का चलन शुरू हुआ। देशी हाकिमों ने अंग्रेजी दवा की बुराई की। मगर 20वीं सदी में अंग्रेजी दवा की पकड़ मजबूत हो गई और देशी दवा दूसरे दर्जे पर चली गई। आज अंग्रेजी दवा अपनी खूबी की वजह से पहली पसंद बन चुकी है। ठीक इसी तरह 20वीं सदी में लाल किताब वजूद में आई। 21वीं सदी में आते आते लाल किताब अपनी खूबी की वजह से कायम हो गई। आज लाल किताब के नाम पर हिंदी में नकल/नकली किताबें बाजार में धड़ाधड़ बिक रहीं हैं। असली किताब जो उर्दू में लिखी गई थी कम ही नजर आती है। इसकी एक वजह यह है कि आज की पीढ़ी को उर्दू नहीं आता। फिर भी नकल /नकली किताबों से कई लोग रोजी रोटी चला रहे हैं।
जिस तरह अंग्रेजी सिस्टम में सर्जरी होने की वजह से वह देशी सिस्टम पर छा गई , उसी तरह लाल किताब ग्रहों के उपाय की वजह से पराशरी पर छा गई। लिहाजा पराशरी के कई विद्वानों ने लाल किताब को अपना लिया चाहे उनके पास असली किताब नहीं है। तो कुछ लोगों ने पराशरी के साथ लाल किताब के उपाय जोड़ लिए यानि आधा तीतर आधा बटेर न छुआरा न बेर। मगर कुछ आज भी लाल किताब की बुराई कर रहे हैं। यह वह लोग हैं जिन्होंने असली किताब कभी देखी ही नहीं। देख भी लें तो भी क्या है? वह इसे पढ़ ही नहीं सकते क्योंकि उनको उर्दू नहीं आता। बस वह तो बिना वजह लाल किताब में नुक्स निकाल रहे हैं। फिजूल के वीडियो बना कर यू- ट्यूब पर डाल रहे हैं। ऐसी बातों से लाल किताब को कोई फर्क नहीं पड़ता। हाँ ऐसे लोगों पर हँसी जरूर आती है। किताब को तो पढ़ नहीं सकते खामख्वाह नुक्ताचीनी कर रहे हैं।
चंद लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने किताब के लिए उर्दू सीखा। फिर रफ्ता रफ्ता मेहनत करके किताब को पढ़ा समझा और कुछ सीखा। आज कुछ नौजवान लड़के किताब के लिए उर्दू सीख रहे हैं मुझे उनसे बहुत उम्मीद है। आने वाले वक्त में वह लाल किताब को और भी बुलंदी पर लेकर जायेंगे। मेरी दुआऐं उनके साथ हैं। वैसे भी पुराने सिस्टम को नया सिस्टम बदल देता है। आज जोतिश का नया सिस्टम है लाल किताब।

Friday, June 22, 2018

पैसा

दुनियां में आदमी की पहली और आखिरी ज़रूरत पैसा ही है। पैदा होने से लेकर मरने तक पैसा ही काम आता है। अगर पैसा हो तो ज़िन्दगी में ज्यादातर मुश्किलें आसान हो जाती हैं या आती ही नहीं। इस काइनात में आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो पैसा कमाता है। पैसे का मतलब धन दौलत से ही है। आदमी पैसा कमाने के लिए तरह-तरह के काम करता है। पैसा कमाने के लिए कई तरीके अपनाता है। सुना है कि धार्मिक स्थानों के भिखारी भी अच्छे पैसे बना लेते हैं। ’’ गरीबों की सुनो, वह तुम्हारी सुनेगा तुम एक पैसा दोगे वो 10 लाख देगा।’’ मगर आज पैसे का सिक्का बाज़ार से गायब हो गया है। बस रूपए का सिक्का है वह भी स्टील का। बर्तानवी हकूमत के दौरान रूपया चाँदी का और पैसा तांबे का होता था। रूपये में 64 पैसे हुआ करते थे। सिक्कों पर हकूमत की मोहर होती थी। सन् 1944 के आस पास पैसे में सुराख कर दिया गया यानि तांबा कम करके उसकी कीमत में बचत की गई। आज़ादी के बाद सरकार ने रूपये में 100 पैसे कर दिए मगर छोटे-छोटे। कुछ साल बाद वह भी बन्द हो गये। तांबे की कीमत भी कई गुणा बढ़ गई थी।
आज पैसे का नाम कहानियों और किताबों में ही रह गया है। लाल किताब में मंदे बुध को दुरूस्त करने के लिए तांबे के पैसे का ज़िक्र है। मसलन् बुध खाना नम्बर 5 या 11 में हो तो तांबे का पैसा गले में डालने से मदद होगी। खास हालत में तांबे के पैसे में सुराख करके दरिया में बहाना मददगार होगा। आखिर क्या है यह तांबे का पैसा ? गोल पैसा तांबे का, तांबा सूरज तो गोलाई बुध, उस पे राजशाही या हकूमत की मोहर। बन्दर को भी लाल किताब में सूरज कहा गया है और उसकी पूंछ को बुध। यानि सूरज बुध का साथ खाना नम्बर 5 और 11 जो सूरज का खास मकाम है। सूरज बुध मुश्तर्का यानि मसनूई मंगल नेक जो कुशल मंगल कर देवे। अब आप तांबे के पैसे का राज़ समझ ही गये होंगे। क्या ही अच्छा हो अगर सरकार स्टील की बजाये तांबे के सिक्के जारी करे।

Friday, February 16, 2018

शुक्र-मंगल-शनि

                शक्र  मंगल  शनि मुश्तर्का, मालिक होवे लम्बी उम्र का।
                                नेक होकर जब बैठे हों ,     गृहस्त औलाद भी देते हों।
                                दुश्मन  अगर मुकाबिल आये, मददगार  आवे बिन बुलाये।
                                अगर   फांसी  भी  हो  जावेकोई  गैबी  शै  बचावे।
                                पांव  तले  दे तख्ता  देवे, तांकि  गला    घुट  जावे।
                                मौत  का  यम ले भी  जावे, कब्र से ज़िन्दा वापिस आवे।
                                दुख  तकलीफ़  से बचता जाये, कामकाज भी होता जाये।
                                सुख  जीवन  में  मिलें  तमाम, उम्र  सारी  रहे  आराम।

                नेक हालत में गृहस्त, औलाद और उम्र, तीनों दुनियावी सुखों का उम्दा फल होगा। ऐसी ग्रहचाल के वक्त उम्र लम्बी होने में मदद मिलेगी। अगर फांसी पर भी लटका दिया जावे तो गैबी मदद पांव तले तख्ता दे देगी तांकि गला घुट जावे। अगर कोई मारने जाये तो मालिक की कृपा से बचाने वाला भी खुद--खुद पहुंचेगा। जिस तरह दुश्मन को बुलाया था, उसी तरह मददगार भी बिन बुलाये जायेगा। ऐसा शख्स दूसरों से मदद और आराम पाता रहेगा। मुसीबत और बिमारी से बचता बचाता हुआ पूरी उम्र भोगेगा। यहां तक कि मौत के यम के खिलाफ भी मदद मिल जायेगी और कब्र से ज़िन्दा वापिस जावेगा। बाप की मदद और सुख सागर लम्बा होगा। शुक्र मंगल शनि मुश्तर्का की कुछ मिसालें दिलचस्पी का सबब होंगी। समझदार के लिए इशारा ही काफी।
                                   






                कुण्डली नम्बर 1 वाली एक खूबसूरत खातून है। अब उम्र 40 साल के आस पास हो गई है मगर शादी हुई। लिहाज़ा गृहस्त सुख मिला क्योंकि तीनों ग्रह खाना नम्बर 3 में नेक नही हैं।

                कुण्डली नम्बर 2 वाले की उम्र 26 साल के आस पास है। तीनो ग्रह खाना नम्बर 7 में हैं। कुण्डली में चन्द्र ग्रहण भी है। इसलिए ग्रहण का उपाय करना बेहतर होगा।

Friday, January 5, 2018

बुध-शुक्र-शनि


बुध शुक्र शनि  जब मुश्तर्का, मालिक होवे  धन दौलत का
ग्रह   तीनो  नेक  हों  टेवे, उम्र  ग्रहस्त   औलाद  देवे।
अगर  रोशनी छत  से आये, चोरी हो  धन  दौलत जाये।
गऊ  ग्रास जो  देता  जावे, सुख  दुनियावी  तीनो पावे।
पर उल्ट कभी जब होता हो, पराया दुख दलिद्र ढोता हो।

बुध शुक्र और शुक्र शनि आपस में दोस्त हैं। बुध शुक्र शनि मुश्तर्का हो तो कुण्डली वाला गृहस्त, औलाद और उम्र तीनो ही दुनियावी सुखों का मालिक होगा। गऊ ग्रास यानि गाय कौवा और कुत्ता, तीनों को अपनी खुराक से रोटी का टुकड़ा देते रहना मुबारक होगा। मकान में स्काई लाईट (ऊपर आसमान की तरफ से रोशनी के लिए मौघा, रोशनदान) धन दौलत की चोरी व तबाही का सबूत होगा। काली गाय और काले कुत्ते को रोटी देते जाना मददगार होगा। अगर काली गाय और काला कुत्ता अपने ही घर का पालतू हो तो उनको बाहर से किसी और शख़्स की तरफ से रोटी न मिलने देवे वर्ना फायदे की बजाय नुक्सान होगा। यानि बाहर वालों के दुख दलिद्र काली गाय और काले कुत्ते की मार्फ़त खुद अपने ही घर में जमा होते रहेंगे। बुध शुक्र शनि मुश्तर्का की कुछ मिसालें दिलचस्पी का सबब होंगी। समझदार के लिए इशारा ही काफी।
       



कुण्डली नम्बर 1 वाले का घर परिवार है और छत से रोशनी भी आती है जो बन्द न हो सकी। फज़ूल खर्च और नुक्सान होता रहता है। रोशनी छत से आती रहे, दौलत घर से जाती रहे। 
कुण्डली नम्बर 2 वाले का भी मिलता जुलता हाल।  लिहाज़ा छत से आने वाली रोशनी पक्के तौर पर बन्द करवा दी गई तो ग्रह चाल भी बदल गई। रोशनी छत से कर दी बन्द, धन का फिर नुक्सान भी बन्द।

Wednesday, December 6, 2017

अपनी बात - 3

ग्रहों से पहले मुझे लकीरों का शौक हुआ था। कालेज में पहला साल ही था जब कीरो की किताब ’’वैन वर यू बौर्न’’  मेरे हाथ लगी। किताब अच्छी लगी इसलिए कई बार पढ़ी। फिर मैने रफ्ता-रफ्ता कीरो की बाकी किताबें भी हासिल की और उनको बार बार पढ़ा। लिहाज़ा मैं इस नतीजे पर पहंुचा कि कीरो (1866-1936) अपने दौर का बहुत बड़ा पामिस्ट था। इस दौरान दुनिया का कोई भी पामिस्ट उसके मुकाबिल खड़ा न हो सका। उसने अपने दौर की कई मशहूर हस्तियों के हाथों के छापे अपनी किताबों में दिये हैं। इसके अलावा उसने अपने हाथ का छापा भी दिया है। मेरे ख्याल में यह बहुत बड़ी बात है। कीरो को ’’फादर आफ पामिस्ट्री ’’ कहना गलत न होगा।
मैंने कीरो को ही अपना रहबर मान लिया और उसकी किताबों से पामिस्ट्री सीखने लगा। कुछ साल बाद मैंने हाथों के छापे भी लेने शुरू कर दिये जो सीखने और समझने में बहुत काम आये। बीस - बाईस साला उम्र में मेरे पास सैंकड़ो छापे जमा हो चुके थे। मेरी पशीनगोई  बाद में अक्सर सही निकलती थी। काम करने का तरीका कीरो वाला ही था। जिसे देखकर लोग दंग रह जाते थे। क्योंकि उस दौर में मैंने किसी भी पामिस्ट को हाथों का छापा लेते नही देखा। मेहनत और लगन का नतीजा निकलने लगा । दूसरे शहरों से छापे डाक के ज़रिए आने लगे। जिनका जवाब मैं ख़त के ज़रिए दिया करता था। फिर दूसरे मुल्कों से भी छापे आने लगे।
एक दिन एक लड़का मुझे हाथ दिखाने आया। मैंने उसके हाथ का छापा ले लिया और उसको कुछ दिन के बाद आने के लिए कहा तांकि मैं छापे का तसल्ली से मुआयना कर सकूं। उसके हाथ में एक अजब सीधी साफ सुथरी रेखा, गुरू के बुर्ज से बुध के बुर्ज तक, मेरे लिए एक नई बात थी। मैंने कीरो की किताबें दोबारा देख डाली मगर उस रेखा का केाई ज़िक्र न मिला। फिर मैंने पामिस्ट्री के कुछ और लेखकों की किताबें भी देखीं मगर उस रेखा की किसी ने भी बात न की थी।  वह अजब रेखा मेरे लिए सवालिया निशान बन के रह गई। मुझे अपने आप में कमी महसूस होने लगी।
उस रेखा ने मुझे परेशान कर दिया। यह कैसी रेखा थी जो पहले किसी ने नही देखी ? कीरो ने भी नही देखी, यह कैसे हो सकता था ? मैने कीरो की किताबें फिर से देखनी शुरू कर दीं। सुबह से शाम बस एक ही काम। एक दिन पढ़ते-पढ़ते रात को मेरी आंख कब लग गई, मुझे पता ही न चला। बादलों की गड़गड़ाहट से अचानक मेरी आंख खुली। आसमानी बिजली की चमक से कमरे में कुछ उजाला हुआ। मैंने देखा कुर्सी पर एक गोरा आदमी बैठा मुस्करा रहा था। चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लगा। फिर बिजली की चमक गायब हो गई और कमरे में अंधेरा छा गया। यह क्या ? मैंने झट से उठकर कमरे की बिजली जलाई मगर कमरे में  कोई न था। कुर्सी खाली पड़ी थी। मेरे सिरहाने कीरो की किताब खुली पड़ी थी। मेरी नज़र उस पर पड़ी। उस रेखा के बारे तफ़सील से लिखा हुआ मिल गया। मैं हैरान रह गया। समझ नही आया कि यह कोई करिश्मा था या महज़ इत्तफ़ाक। ख़ैर मेरा मसला हल हो गया और दिल को सकून मिल गया।